कर्म का नियम क्या है? क्या जैसा बीज वैसा वृक्ष वास्तव में सत्य है? क्या कर्मों का फल अवश्य मिलता है?
'कर्म' शब्द का अर्थ है - कोई भी क्रिया, कार्य, या व्यवहार। सनातन दर्शन के अनुसार, यह संपूर्ण ब्रह्मांड कर्म के सिद्धांत पर चलता है - जैसा बीज बोओगे, वैसा ही फल पाओगे।
यह केवल धार्मिक अवधारणा नहीं है - यह प्रकृति का मूल नियम है। जैसे आम के बीज से आम का पेड़ उगता है, सेब के बीज से सेब का - वैसे ही अच्छे कर्मों से अच्छे फल और बुरे कर्मों से बुरे फल मिलते हैं।
कर्म का नियम ब्रह्मांड की न्याय व्यवस्था है। यह निष्पक्ष, अटल और सार्वभौमिक है।
आइए, इस कर्म नियम के हर पहलू को विस्तार से समझें।
यथा बीजं तथा वृक्षः
"यथा बीजं तथा वृक्षः, यथा संकल्प तथा फलम्। यथा पात्र तथा ज्ञानम्, यथा पादं तथा गतिः॥" (जैसा बीज, वैसा वृक्ष; जैसा संकल्प, वैसा फल; जैसा पात्र, वैसा ज्ञान; जैसे पैर, वैसी गति।)
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कर्म का अर्थ: क्रिया और उसका परिणाम
कर्म का शाब्दिक अर्थ है - किया गया कार्य। पर गहरे अर्थ में, यह क्रिया और उसके परिणाम के बीच के अटल संबंध को कहते हैं। हर क्रिया का एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है - यह न्यूटन का तीसरा नियम है। हर कारण का एक प्रभाव होता है - यह कर्म नियम है। कर्म का नियम कहता है कि हम जो भी करते हैं, उसका परिणाम हमें अवश्य भोगना पड़ता है। यह परिणाम तुरंत, कुछ समय बाद, या अगले जन्म में भी हो सकता है। पर यह अवश्य होता है। कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता। यही कर्म सिद्धांत का मूल है। कर्म को भाग्य (नियति) के साथ भ्रमित नहीं करना चाहिए। भाग्य वह है जो हमारे पिछले कर्मों का परिणाम है (प्रारब्ध)। वर्तमान कर्म (क्रियमाण) हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं।
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गीता में कर्म का रहस्य
श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कर्म के सबसे गहरे रहस्य को समझाया है। वे कहते हैं - "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" (तुम्हें केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर कभी नहीं।) इसका अर्थ यह नहीं कि फल नहीं मिलता, बल्कि यह है कि हमें फल की चिंता किए बिना, केवल कर्तव्य भाव से कर्म करना चाहिए। कृष्ण तीन प्रकार के कर्म बताते हैं - कर्म (शास्त्र विहित कर्म), विकर्म (निषिद्ध कर्म), और अकर्म (जो कर्म नहीं कर रहा है, पर दिख रहा है।) सबसे गहरा रहस्य - "यः कर्मणि कर्म यः पश्येत् अकर्मणि स बुद्धिमान्" (जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वही बुद्धिमान है।) अर्थात, ज्ञानी व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कर्ता नहीं बनता, वह साक्षी रहता है।
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कर्म के तीन प्रकार
शास्त्रों में कर्म को तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है - सचित (संचित), प्रारब्ध, और क्रियमाण (आगामी)।
'सचित कर्म' वह संचित कोष है जो हमारे पिछले अनंत जन्मों के कर्मों का पुंज है। यह हमारे संस्कारों, स्वभाव, प्रवृत्तियों का भंडार है।
'प्रारब्ध कर्म' उस संचित का वह अंश है जो इस जन्म में भोगना निश्चित है। यही हमारी 'नियति' या 'भाग्य' कहलाती है। इसका भोग करना ही होता है, पर इसे ज्ञान से बदला जा सकता है।
'क्रियमाण कर्म' वे कर्म हैं जो हम इस जन्म में कर रहे हैं। ये ही हमारे भविष्य के प्रारब्ध को बनाते हैं। इन पर हमारा पूरा नियंत्रण है। ज्ञानी व्यक्ति सचित को ज्ञान से जला सकता है, प्रारब्ध को शांति से भोगता है, और क्रियमाण को बुद्धिमानी से करता है।
चार प्रकार के कर्म (विस्तार से)
1. सचित (संचित) कर्म: अनंत जन्मों में एकत्रित सभी कर्मों का भंडार। यह बीजों के एक बड़े भंडार के समान है। ये बीज कभी भी अंकुरित हो सकते हैं।
2. प्रारब्ध कर्म: सचित कर्म का वह अंश जो इस जन्म के लिए चुन लिया गया है। इसका भोग करना ही होगा। यही कारण है कि कुछ लोग सुखी पैदा होते हैं, कुछ दुखी। जैसे तीर छूटने के बाद वापस नहीं आता, वैसे ही प्रारब्ध का भोग अनिवार्य है।
3. क्रियमाण (आगामी) कर्म: वे कर्म जो हम इस जन्म में अभी कर रहे हैं। ये हमारे भविष्य के प्रारब्ध का निर्माण करते हैं। इन पर हमारा पूरा अधिकार है। यही 'वर्तमान' की शक्ति है।
4. वर्तमान कर्म: कुछ विद्वान चौथे प्रकार का भी उल्लेख करते हैं - तात्कालिक कर्म, जिनका फल तुरंत मिलता है। जैसे आग को छूना - तुरंत जलना। यह 'दृष्ट फल' कहलाता है।
कर्म का वैज्ञानिक आधार
न्यूटन का तीसरा नियम
प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। यह भौतिक संसार में कर्म नियम का ही एक रूप है। हर कार्य का परिणाम होता है।
कारण और प्रभाव का नियम
विज्ञान के मूल सिद्धांतों में से एक - हर घटना का एक कारण होता है, और हर कारण का एक प्रभाव। कर्म नियम यही है।
क्वांटम उलझाव
क्वांटम यांत्रिकी में, दो कण एक दूसरे से प्रभावित होते हैं, चाहे कितनी भी दूर क्यों न हों। यह बताता है कि हमारे कर्म दूर तक प्रभाव डाल सकते हैं।
एंट्रॉपी (अव्यवस्था का नियम)
प्रणाली हमेशा अव्यवस्था की ओर बढ़ती है। अच्छे कर्म (व्यवस्था बनाए रखना) प्रयास माँगते हैं, बुरे कर्म (अव्यवस्था) आसान हैं।
शास्त्रों में कर्म सिद्धांत
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥" (तुम्हें केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर कभी नहीं। तुम कर्म के फल के साधन मत बनो, और अकर्म में आसक्त मत हो।)
- श्रीमद्भगवद्गीता (2.47)
"यज्जीव्यते क्षणमपि प्रथितं मनुष्यैः वीर्योचितं सुखकरं च तदेव जीवितम्। न तु दीर्घता कृमिकुलाय इवात्मनाशाय॥" (एक क्षण भी यदि वीरतापूर्वक और सुखकर जीया जाए, तो वही सच्चा जीवन है। लंबी आयु, यदि कर्महीन हो, तो कीड़ों के समान है।)
- महाभारत
"अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।" (किए गए शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है।)
- महाभारत, शांति पर्व
"न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥" (कोई भी क्षण भर के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण सबको विवश करके कर्म कराते हैं।)
- गीता (3.5)
कर्म, स्वतंत्र इच्छा और नियति
प्रारब्ध (भाग्य)
यह हमारे पिछले कर्मों का परिणाम है जो इस जन्म में भोगना तय है। इस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। जैसे - किस परिवार में जन्म, शरीर की संरचना, प्रारंभिक परिस्थितियाँ।
क्रियमाण (वर्तमान कर्म)
यह हमारी स्वतंत्र इच्छा है। हम अपने वर्तमान कर्मों को चुनने में पूर्णतः स्वतंत्र हैं। यही हमारे भविष्य का निर्धारण करता है।
भाग्य नहीं, बल्कि संकल्प
यह भ्रम है कि सब कुछ भाग्य पर निर्भर है। भाग्य केवल प्रारब्ध को कहते हैं। पर हम अपने वर्तमान कर्मों से अपने भाग्य को बदल सकते हैं।
स्वतंत्रता की सीमा
हमारी स्वतंत्र इच्छा भी हमारे पिछले कर्मों (संस्कारों) से सीमित है। पर यह सीमा ज्ञान और साधना से तोड़ी जा सकती है।
जैसा बीज वैसा वृक्ष - बीज और वृक्ष का सिद्धांत: बीज (कर्म): आम का बीज हमेशा आम का पेड़ देगा, सेब का बीज सेब का। जैसे बीज, वैसे वृक्ष। हमारे कर्म (बीज) ही हमारे भविष्य (वृक्ष) का निर्धारण करते हैं। वृक्ष (परिणाम): कर्म का फल कभी-कभी तुरंत मिलता है (जैसे जलना), कभी बाद में (जैसे पेड़ को फल आने में समय लगता है), कभी अगले जन्म में (जैसे कुछ बीज वर्षों बाद अंकुरित होते हैं)। परिस्थितियाँ: बीज के अंकुरण के लिए मिट्टी, पानी, धूप चाहिए। वैसे ही कर्म के फल देने के लिए उचित परिस्थितियाँ चाहिए। यही कारण है कि कभी-कभी फल देर से मिलता है। संकल्प शक्ति: यदि हम अच्छे बीज (अच्छे कर्म) बोते हैं, तो अच्छा वृक्ष (अच्छा भविष्य) पाना निश्चित है। बस धैर्य और निरंतरता चाहिए।
कर्म के 12 नियम
1. कारण और प्रभाव का नियम
हर कारण का एक प्रभाव होता है, और हर प्रभाव का एक कारण। जैसा बीज, वैसा वृक्ष।
2. सृजन का नियम
जीवन स्वयं नहीं आता; हमें इसे सृजित करना होता है। हम अपने विचारों, शब्दों, कर्मों से अपनी वास्तविकता बनाते हैं।
3. विनम्रता का नियम
जो अस्वीकार करना हो, उसे पहले स्वीकार करना होगा। हम तब तक नहीं बदल सकते जब तक हम अपनी वर्तमान स्थिति को नहीं पहचानते।
4. विकास का नियम
हम जहाँ हैं, वहाँ से आगे बढ़ना है। जीवन को बदलने के लिए, हमें खुद को बदलना होगा।
5. जिम्मेदारी का नियम
हम अपने जीवन में जो कुछ भी है, उसके लिए स्वयं जिम्मेदार हैं। किसी और को दोष देना व्यर्थ है।
6. संबंध का नियम
अतीत, वर्तमान और भविष्य आपस में जुड़े हैं। हर कर्म की एक श्रृंखला होती है।
7. फोकस का नियम
आप एक समय में केवल एक ही चीज़ पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। जहाँ ध्यान, वहाँ ऊर्जा।
8. दान और आतिथ्य का नियम
जो आप दोगे, वही पाओगे। यदि आप प्रेम दोगे, तो प्रेम पाओगे। यदि द्वेष दोगे, तो द्वेष पाओगे।
9. क्षण का नियम
वर्तमान क्षण ही एकमात्र क्षण है जिसे हम बदल सकते हैं। अतीत बीत गया, भविष्य अनिश्चित।
10. परिवर्तन का नियम
इतिहास तब तक दोहराता रहेगा जब तक हम उससे सीख नहीं लेते। हमें बदलना होगा।
11. धैर्य और पुरस्कार का नियम
सबसे बड़े पुरस्कारों के लिए सबसे लंबे धैर्य की आवश्यकता होती है। हर अच्छे कर्म का फल मिलता है, समय पर।
12. अर्थ और प्रेरणा का नियम
जो आप देते हैं, वही आपको मिलता है। इसलिए प्रेम, करुणा, शांति देना सीखें - यही सबसे बड़ा कर्म है।
कर्म और भाग्य में अंतर
कर्म
भाग्य (नियति)
Whetherहमारे अधीन (वर्तमान कर्म)
Whetherहमारे अधीन नहीं (पिछले कर्मों का परिणाम)
Whetherबदला जा सकता है
Whetherपूरी तरह बदला नहीं जा सकता, पर प्रभाव कम किया जा सकता है
Whetherहम स्वयं कर्ता हैं
Whetherहम केवल भोक्ता हैं
Whetherवर्तमान और भविष्य निर्धारित करता है
Whetherवर्तमान का आधार है, पर अंतिम नहीं
Whetherस्वतंत्र इच्छा का क्षेत्र
Whetherपूर्व निर्धारित परिस्थितियाँ
अपने कर्म को कैसे सुधारें?
नियमित साधना
ध्यान, योग, मंत्र जप - ये मन को शुद्ध करते हैं, संस्कार बदलते हैं, और अच्छे कर्मों के लिए ऊर्जा देते हैं।
निःस्वार्थ सेवा
बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की सेवा करना - यह सबसे उत्तम कर्म है। सेवा से अहंकार घटता है, प्रेम बढ़ता है।
विचारों की शुद्धि
कर्म केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी होते हैं। बुरे विचार भी बुरे कर्म हैं। अच्छे विचार, सकारात्मक सोच विकसित करें।
प्रायश्चित और क्षमा
यदि कोई बुरा कर्म कर बैठे, तो प्रायश्चित करें। दूसरों को क्षमा करें, और स्वयं को भी। इससे कर्म का बोझ हल्का होता है।
नाम जप
शास्त्र कहते हैं कि ईश्वर के नाम का जप करने से सभी पाप (बुरे कर्म) नष्ट हो जाते हैं। 'राम', 'कृष्ण', 'शिव' नाम का जप करें।
सत्संग
संतों, महात्माओं की संगति करें। उनके विचार, उनके जीवन से प्रेरणा लें। सत्संग से कर्म सुधरते हैं।
कर्म के बारे में आम गलत धारणाएँ: गलत धारणा 1: "सब कुछ भाग्य पर निर्भर है, हम कुछ नहीं कर सकते।" - सत्य: हमारे वर्तमान कर्मों पर हमारा पूरा नियंत्रण है। गलत धारणा 2: "कर्म का फल तुरंत मिलता है।" - सत्य: फल तुरंत, देर से, या अगले जन्म में मिल सकता है। गलत धारणा 3: "अच्छे लोगों को दुख क्यों?" - सत्य: दुख उनके पिछले जन्म के बुरे कर्मों के कारण हो सकता है। या वर्तमान कर्मों का परिणाम अभी नहीं दिख रहा। गलत धारणा 4: "कर्म का नियम ईश्वर से अलग है।" - सत्य: कर्म का नियम ईश्वर का ही नियम है। ईश्वर कर्म का फल देने वाले हैं। गलत धारणा 5: "केवल बुरे कर्मों का फल मिलता है, अच्छे कर्मों का नहीं।" - सत्य: दोनों का फल मिलता है। अच्छे कर्म अच्छा फल देते हैं। गलत धारणा 6: "कर्म का फल टाला नहीं जा सकता।" - सत्य: प्रारब्ध तो भोगना ही पड़ता है, पर साधना, प्रार्थना, कृपा से उसका प्रभाव कम किया जा सकता है।
कर्म से जुड़े प्रश्न
क्या कर्म का नियम वास्तव में सत्य है?
हाँ, कर्म का नियम ब्रह्मांड का मूल सिद्धांत है, और अनगिनत अनुभव इसकी पुष्टि करते हैं। जीवन में देखें - जो व्यक्ति मेहनत करता है (अच्छा कर्म), उसे सफलता मिलती है। जो आलसी है (बुरा कर्म), वह पिछड़ जाता है। जो दूसरों की मदद करता है, उसे भी मदद मिलती है। जो दूसरों को धोखा देता है, उसे भी कोई न कोई धोखा देता है। यह तात्कालिक कर्म का परिणाम है। जीवन के बड़े उतार-चढ़ाव - क्यों कुछ लोग सुखी पैदा होते हैं, कुछ दुखी - इसका उत्तर कर्म के बिना नहीं मिलता। संतों, महात्माओं, बुद्ध, महावीर, कृष्ण - सभी ने कर्म के नियम को सत्य माना। आधुनिक विज्ञान का नियम - 'प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया' - यह भी कर्म नियम का ही एक रूप है। अतः, कर्म का नियम सार्वभौमिक, अटल, और सत्य है। इस पर विश्वास रखें, तो जीवन सरल हो जाता है।
यदि कोई बहुत बुरे कर्म करता है, तो क्या वह कभी सुधर सकता है?
हाँ, अवश्य! कर्म का नियम घातक नहीं है, यह संशोधनीय है। यह न्यायालय के समान नहीं है जो केवल दंड देता है। कर्म का नियम शिक्षक की तरह है - यह हमें सुधरने का अवसर देता है। बहुत से उदाहरण हैं - अजामिल नामक व्यक्ति ने जीवन भर बुरे कर्म किए, पर मृत्यु के समय 'नारायण' नाम जपने से उसका उद्धार हुआ। वाल्मीकि डाकू थे, पर उन्होंने तपस्या की और 'वाल्मीकि रामायण' जैसा महाकाव्य लिखा। अंगुलिमाल ने 999 लोगों की हत्या की, पर बुद्ध के संपर्क में आकर वह संत बन गए। सच्चा पश्चाताप, प्रायश्चित, ईश्वर का नाम जप, सत्संग, अच्छे कर्म - ये सब पिछले बुरे कर्मों को नष्ट कर सकते हैं। ज्ञान तो सभी कर्मों को जला सकता है। कहा भी गया है - 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते' (ज्ञान की अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है)। इसलिए निराशा न करें - आज से अच्छे कर्मों की शुरुआत करें, और सब कुछ बदल जाएगा।
क्या पशुओं, पौधों के भी कर्म होते हैं?
हाँ, सभी जीवों के कर्म होते हैं, पर उनकी स्वतंत्र इच्छा की सीमा अलग होती है। शास्त्रों के अनुसार, चेतना के 84 लाख योनियाँ (प्रजातियाँ) हैं। मनुष्य सबसे विकसित चेतना वाला है, इसलिए उसे सबसे अधिक स्वतंत्र इच्छा प्राप्त है। पशु-पक्षी अपनी प्रवृत्ति (इंस्टिंक्ट) से अधिक संचालित होते हैं। वे जीवन यापन के लिए कर्म करते हैं, पर 'मैं कर रहा हूँ' का भाव (अहंकार) उनमें कम होता है। उनके कर्मों का फल भी मिलता है, पर वे मुख्यतः उनके प्रारब्ध (पिछले जन्म के कर्मों का परिणाम) का भोग कर रहे होते हैं। जब वे मरते हैं, तो उनके कर्मों के अनुसार उन्हें दूसरी योनि मिलती है। यही संसार का चक्र है। यही कारण है कि मानव जीवन इतना दुर्लभ और मूल्यवान है - यहाँ हम मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए। जानवरों के प्रति हिंसा करना भी बुरा कर्म है, क्योंकि वे भी चेतन प्राणी हैं।
क्या कर्म और पुनर्जन्म (पुनर्जन्म) दोनों एक साथ सत्य हैं?
हाँ, कर्म और पुनर्जन्म दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि केवल कर्म होता, पर पुनर्जन्म नहीं होता, तो कई प्रश्न अनुत्तरित रह जाते - जन्मजात अंतर क्यों? कुछ बच्चे जन्म से ही प्रतिभाशाली क्यों होते हैं, कुछ विकलांग क्यों? कुछ सुखी परिवार में जन्म लेते हैं, कुछ दुखी में? कर्म का उत्तर है - ये सब उनके पिछले जन्मों के कर्मों के परिणाम हैं। पुनर्जन्म के बिना कर्म का नियम अधूरा है। बहुत से बच्चे अपने पिछले जन्मों के विवरण देते हैं (आईयान स्टीवेन्सन के शोध, 2500 से अधिक मामले)। इससे पुनर्जन्म की पुष्टि होती है। कर्म और पुनर्जन्म मिलकर संसार के चक्र (जन्म-मृत्यु-पुनर्जन्म) को स्पष्ट करते हैं। जब तक मोक्ष (कर्मों का पूर्ण क्षय और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति) नहीं मिलती, तब तक आत्मा अलग-अलग योनियों में जन्म लेती है, अपने कर्मों का फल भोगती है। यही शास्त्रों का सिद्धांत है।
गीता में कर्म के बारे में सबसे महत्वपूर्ण उपदेश क्या है?
गीता में कर्म का सबसे महत्वपूर्ण उपदेश है - निष्काम कर्म। श्रीकृष्ण कहते हैं - "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" (तुम्हें केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर कभी नहीं।) इसका सीधा अर्थ है - हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, पर उनके फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। यह अत्यंत क्रांतिकारी विचार है। सामान्यतः हम सोचते हैं - "मैं यह करूँगा, तो यह फल मिलेगा।" पर कृष्ण कहते हैं - फल तो कई कारकों पर निर्भर करता है - इच्छा, परिस्थिति, दूसरों के कर्म, ईश्वर की कृपा। इसलिए फल की चिंता छोड़कर, केवल कर्तव्य भाव से कर्म करो। यही 'योग' है - समत्व बुद्धि। यही कारण है कि कृष्ण अर्जुन से कहते हैं - तू युद्ध कर (अपना कर्तव्य पालन कर), पर यह मत सोच कि मैं जीतूँगा या हारूँगा। फल की चिंता मुझ पर छोड़ दे। यही सबसे बड़ा उपदेश है। निष्काम कर्म ही मोक्ष का मार्ग है।
जैसा बीज, वैसा वृक्ष। आज से अच्छे बीज बोएँ - प्रेम, करुणा, सेवा, सत्य, अहिंसा। और देखें कि कैसे आपका जीवन बदलता है। कर्म का नियम अटल है। इसलिए सावधानी से कर्म करें, और आनंदपूर्वक फल भोगें।