परमात्मा क्या है?

परब्रह्म, सर्वोच्च चेतना और जीवात्मा का परम ध्येय

परमात्मा क्या है? | आत्मा और परमात्मा का संबंध

परमात्मा क्या है? क्या वह भगवान से अलग है? आत्मा और परमात्मा में क्या अंतर है? सनातन दर्शन में परमात्मा उस सर्वोच्च सत्ता को कहा गया है जो सृष्टि का कारण, आधार और नियंता है। वह नित्य, शाश्वत, सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। जहाँ आत्मा व्यष्टि चेतना है, वहीं परमात्मा समष्टि चेतना है - जिस प्रकार एक बूँद (आत्मा) और सागर (परमात्मा) का संबंध। आइए, इस परम रहस्य को विस्तार से समझें।

आत्मा परमात्मा का अंश है। बूँद सागर का।

"यथा एकेन चक्रेण न यायाद्रथः। एवं आत्मना विना परमात्मा न प्रकाशते।"
(जैसे एक पहिये से रथ नहीं चलता, वैसे ही आत्मा के बिना परमात्मा का प्रकाश नहीं होता।)

परमात्मा: सर्वोच्च चेतना का स्वरूप

नित्य और शाश्वत (Eternal)

परमात्मा का न कोई आदि है, न अंत। वह सदा से है और सदा रहेगा। सृष्टि के उत्पत्ति और प्रलय के समय भी वह अपरिवर्तित रहता है। वह समय से परे है।

सर्वव्यापी (Omnipresent)

परमात्मा हर जगह, हर समय, हर कण में व्याप्त है। वह अणु से भी छोटा और महान से भी महान है। कोई स्थान उससे रिक्त नहीं। वह सबका अंतर्यामी है।

सर्वज्ञ (Omniscient)

परमात्मा सब कुछ जानता है - भूत, वर्तमान, भविष्य। हमारे विचार, हमारे कर्म, हमारी इच्छाएँ - सब उसके ज्ञान में हैं। उससे कुछ छिपा नहीं है।

सर्वशक्तिमान (Omnipotent)

परमात्मा में असीम शक्ति है। वह संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन करता है। उसकी इच्छा से ही सृष्टि होती है, पलती है और लीन होती है।

परम दयालु (Supremely Compassionate)

परमात्मा असीम करुणा और प्रेम का सागर है। वह अपने भक्तों का कभी त्याग नहीं करता। उसकी कृपा से ही जीव को मुक्ति मिलती है।

निराकार एवं साकार (Formless & With Form)

परमात्मा निराकार ब्रह्म भी है और साकार ईश्वर भी। भक्तों की भावना के अनुसार वह रूप धारण करता है। पर उसका मूल स्वरूप निराकार ही है।

आत्मा और परमात्मा का संबंध

जीवात्मा (Individual Soul) परमात्मा (Supreme Soul) ब्रह्म (Cosmic Consciousness) मुक्ति (Liberation)

आत्मा और परमात्मा का संबंध अग्नि और उसकी चिंगारी के समान है। चिंगारी अग्नि से अलग नहीं, फिर भी उसमें अग्नि के सभी गुण नहीं होते। इसी प्रकार, आत्मा परमात्मा का अंश है, पर माया के कारण उससे विलग प्रतीत होता है।

आत्मा (Individual Soul) परमात्मा (Supreme Soul)
एक बूँद के समान (A drop) संपूर्ण सागर के समान (The whole ocean)
एक शरीर में निवास करता है (Dwells in one body) सभी शरीरों में व्याप्त है (Pervades all bodies)
अज्ञान और माया से आच्छादित (Covered by ignorance) सदा ज्ञानस्वरूप (Ever pure consciousness)
कर्मों के अधीन (Subject to karma) कर्मों का नियंता (Controller of karma)
जन्म-मृत्यु के चक्र में (In cycle of birth-death) अजन्मा, अमर (Unborn, immortal)
परमात्मा का अंश (Part of Paramatma) संपूर्ण (The whole)
मुक्ति चाहता है (Seeks liberation) मुक्ति देने वाला (Giver of liberation)

उपनिषदों और संतों की वाणी में परमात्मा

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।"
(इस संपूर्ण जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है।)
- ईशावास्य उपनिषद्
"सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म।"
(ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, अनंत है।)
- तैत्तिरीय उपनिषद्
"अणोरणीयान महतो महीयान आत्मा गुहायां निहितोस्य जंतोः।"
(आत्मा अणु से भी छोटा और महान से भी महान है।)
- कठ उपनिषद्
"वह सूर्य के समान प्रकाशमान है, पर सूर्य उसे प्रकाशित नहीं करता।"
- श्वेताश्वतर उपनिषद्
"परमात्मा वह है जिसे देखा नहीं जा सकता, पर जिसके द्वारा सब देखा जाता है।"
- आदि शंकराचार्य
"जैसे नदियाँ सागर में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती हैं, वैसे ही आत्मा परमात्मा में मिलकर मुक्त हो जाता है।"
- स्वामी विवेकानंद

आत्मा की यात्रा: जीव से परमात्मा तक

1

जीवावस्था (State of Bondage)

आत्मा अज्ञान और माया के कारण शरीर, मन और इंद्रियों से तादात्म्य कर लेती है। वह 'मैं शरीर हूँ' की भावना में जीता है और कर्मों का बंधन बनाता है।

2

साधनावस्था (State of Seeking)

जीव को अपनी अपूर्णता का अनुभव होता है। वह सत्य की खोज में निकलता है - गुरु की शरण में जाता है, शास्त्रों का अध्ययन करता है, साधना करता है।

3

ज्ञानावस्था (State of Realization)

गुरु की कृपा और साधना से जीव को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है। वह जान जाता है कि वह शरीर नहीं, आत्मा है।

4

मुक्त्यवस्था (State of Liberation)

परम ज्ञान में आत्मा को अपने और परमात्मा के अभेद का अनुभव होता है। वह ब्रह्म में लीन हो जाता है। यही मोक्ष है।

परमात्मा कहाँ निवास करते हैं?

❤️ हृदय में (अंतर्यामी)
गीता (15.15) में कृष्ण कहते हैं - "मैं सबके हृदय में बैठा हूँ।" परमात्मा प्रत्येक जीव के हृदय में साक्षी रूप में निवास करते हैं।
🌌 सर्वत्र (सर्वव्यापी)
परमात्मा हर जगह हैं - इस पृथ्वी में, जल में, वायु में, आकाश में, हर कण-कण में। वह स्थूल और सूक्ष्म सबमें व्याप्त हैं।
✨ अपने धाम में (Vaikuntha/Kailash)
भक्तों की भावना के अनुसार, परमात्मा अपने दिव्य धाम में भी निवास करते हैं - वैकुंठ, कैलाश, गोलोक आदि।
🧘 सच्चिदानंद स्वरूप
परमात्मा का वास्तविक स्वरूप सत् (अस्तित्व), चित् (ज्ञान) और आनंद (परम सुख) है। वह इन तीनों का सागर है।

विभिन्न दर्शनों में परमात्मा

दर्शन परमात्मा की अवधारणा आत्मा-परमात्मा संबंध
अद्वैत वेदांत निर्गुण, निराकार ब्रह्म ही परम सत्य है। आत्मा और परमात्मा अभिन्न हैं। 'अहं ब्रह्मास्मि'।
विशिष्टाद्वैत सगुण साकार ईश्वर (विष्णु/नारायण) परमात्मा हैं। आत्मा परमात्मा का अंश है, पर उससे भिन्न।
द्वैत वेदांत सर्वोच्च सत्ता (विष्णु) परमात्मा हैं। आत्मा और परमात्मा सदा अलग-अलग हैं।
शैव दर्शन शिव ही परमात्मा हैं - सगुण एवं निर्गुण दोनों। आत्मा शिव का अंश है, पर शिव में ही लीन हो सकता है।
शाक्त दर्शन आदि शक्ति (देवी) ही परमात्मा हैं। शिव-शक्ति का मिलन ही परम सत्य है।

परमात्मा को कैसे पहचानें और प्राप्त करें?

🙏 परमात्मा साक्षात्कार के उपाय:
ध्यान: प्रतिदिन ध्यान में बैठें। मन को एकाग्र करें। 'सोऽहम्' (वह मैं हूँ) की भावना का अभ्यास करें।
सत्संग: संतों और ज्ञानियों का संग करें। उनके प्रवचन सुनें।
स्वाध्याय: उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्र आदि का अध्ययन करें।
नाम जप: किसी एक नाम का निरंतर जाप करें - ॐ, राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि।
विवेक: नित्य-अनित्य का विवेक रखें। शरीर और आत्मा में अंतर समझें।
वैराग्य: भोगों की क्षणभंगुरता को समझें और आसक्ति से दूर रहें।
गुरु कृपा: सद्गुरु की शरण में जाएँ। उनके निर्देशों का पालन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

परमात्मा और भगवान में क्या अंतर है?
सामान्यतः 'भगवान' शब्द का प्रयोग सगुण साकार रूप के लिए होता है - जैसे राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि। 'परमात्मा' शब्द अधिक व्यापक है - यह निराकार ब्रह्म से लेकर साकार ईश्वर तक सभी को समाहित करता है। भगवान परमात्मा के ही साकार रूप हैं। परमात्मा सभी भगवानों का आधार है।
क्या हम परमात्मा को देख सकते हैं?
परमात्मा इंद्रियों का विषय नहीं है, इसलिए उसे आँखों से नहीं देखा जा सकता। पर उसे 'अनुभव' किया जा सकता है। गहरे ध्यान और समाधि की अवस्था में योगी परमात्मा के दिव्य प्रकाश का साक्षात्कार करते हैं। भक्ति मार्ग में भगवान के साकार रूप के दर्शन संभव हैं। कबीर कहते हैं - "जब मैं था, तब हरि नहीं थे। अब हरि हैं, तब मैं नहीं।"
क्या परमात्मा हमारी प्रार्थना सुनते हैं?
हाँ, परमात्मा अंतर्यामी हैं - वह हमारे हृदय की हर बात जानते हैं। बिना शब्दों के भी हमारी भावना को समझते हैं। गीता में कृष्ण कहते हैं - "जो मुझे प्रेम से पत्ता, फूल, फल या जल भी अर्पित करता है, मैं उसे प्रेम से ग्रहण करता हूँ।" परमात्मा हमेशा हमारी प्रार्थना सुन रहे हैं, बस उत्तर उनकी इच्छा से मिलता है।
क्या सभी धर्मों में परमात्मा एक ही है?
हाँ, परम सत्य एक ही है, चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारें - अल्लाह, यहोवा, गॉड, वाहेगुरु, अहुरा मज़्दा। सभी धर्म उसी एक परमात्मा तक पहुँचने के मार्ग हैं। ऋग्वेद कहता है - "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं)। भाव और श्रद्धा महत्वपूर्ण है, नाम नहीं।
क्या परमात्मा पुरुष है या स्त्री?
परमात्मा न तो पुरुष है, न स्त्री। वह निर्गुण-निराकार है। लेकिन भक्तों की भावना के अनुसार, वह पुरुष रूप (राम, कृष्ण, शिव) या स्त्री रूप (दुर्गा, काली, लक्ष्मी) में भी प्रकट होते हैं। दरअसल, परमात्मा में पुरुष और स्त्री दोनों ही ऊर्जाएँ समाहित हैं - शिव और शक्ति का मिलन ही वह है।
क्या मृत्यु के बाद आत्मा परमात्मा में मिल जाती है?
सामान्य मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार नया शरीर धारण करती है। परमात्मा में मिलन (मोक्ष) तभी होता है जब आत्मा ने जीवित अवस्था में ही सभी कर्मों से मुक्ति पा ली हो और ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया हो। ऐसी मुक्त आत्मा पुनः जन्म नहीं लेती, बल्कि परमात्मा में लीन हो जाती है - जैसे नदी सागर में मिल जाती है।

परमात्मा को अपने जीवन में अनुभव करें

परमात्मा निकट है, बस पहचानने की देर है:
हर साँस में: साँस लेते समय 'सो' और छोड़ते समय 'हम' का अनुभव करें। यही 'सोऽहम्' साधना है।
हर अनुभव में: सुख-दुख, लाभ-हानि सबमें उसकी लीला देखें। कहें - "तेरी इच्छा।"
हर प्राणी में: सबमें एक ही परमात्मा को देखें। किसी से द्वेष न करें। सबमें प्रेम करें।
हर कर्म में: हर कर्म को परमात्मा को अर्पित करें। फल की इच्छा न रखें।
हर क्षण में: जान लें कि परमात्मा इस क्षण भी आपके साथ हैं, आपके भीतर हैं।

आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा

वह तुमसे दूर नहीं, तुम्हारे भीतर ही बसा है। बस पहचानो।

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