ब्रह्मांड की उत्पत्ति: सनातन और विज्ञान का समन्वय
सनातन ग्रंथों में ब्रह्मांड निर्माण का विस्तृत वर्णन और आधुनिक विज्ञान से तुलनात्मक अध्ययन
ब्रह्मांड की उत्पत्ति मानव जिज्ञासा का सबसे रोचक विषय रहा है। आधुनिक विज्ञान "बिग बैंग" सिद्धांत के माध्यम से ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझने का प्रयास करता है, जबकि सनातन ग्रंथों में इसका विस्तृत और वैज्ञानिक वर्णन हज़ारों वर्ष पूर्व ही मिलता है।
"हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥"
- ऋग्वेद 10.121.1
"सृष्टि के आरंभ में हिरण्यगर्भ (स्वर्ण भ्रूण) था।
वह समस्त भूतों का जन्मदाता, एकमात्र स्वामी था।
उसने पृथ्वी और आकाश को धारण किया।
हम किस देवता की हवि (आहुति) दें?"
मूल प्रश्न: ब्रह्मांड कैसे बना?
भौतिक विज्ञान का प्रश्न
बिग बैंग क्या था? ब्रह्मांड का प्रारंभिक विस्तार कैसे हुआ? पदार्थ और ऊर्जा कहाँ से आई?
खगोल विज्ञान का प्रश्न
तारे, ग्रह, आकाशगंगाएँ कैसे बनीं? ब्रह्मांड का वर्तमान संरचना और भविष्य क्या है?
दार्शनिक प्रश्न
ब्रह्मांड का उद्देश्य क्या है? मानव जीवन का ब्रह्मांड से क्या संबंध है?
सनातन दर्शन इन सभी प्रश्नों का उत्तर "सृष्टि चक्र" के माध्यम से देता है। ब्रह्मांड का निरंतर सृजन, स्थिति और संहार होता रहता है। यह अनादि और अनंत प्रक्रिया है।
सनातन ग्रंथों में ब्रह्मांड उत्पत्ति
वेदों में वर्णन
ऋग्वेद के पुरुषसूक्त (10.90) में ब्रह्मांड की उत्पत्ति को विराट पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है। इस सूक्त के अनुसार, सम्पूर्ण ब्रह्मांड विराट पुरुष से ही उत्पन्न हुआ है।
हिरण्यगर्भ
स्वर्ण अंडे के रूप में ब्रह्मांड की प्रारंभिक अवस्था का वर्णन
सृष्टि चक्र
सृष्टि, स्थिति और संहार का निरंतर चक्र - कल्प की अवधारणा
विस्तार
ब्रह्मांड का लगातार विस्तार - सनातन में "ब्रह्मांड का फैलाव"
मनु स्मृति (अध्याय 1) में विस्तार से बताया गया है कि ब्रह्मा ने कैसे ब्रह्मांड की रचना की। प्रथम मनु स्वयंभू मनु कहलाए, जिनसे मानव जाति की उत्पत्ति हुई।
उपनिषदों में वर्णन
छान्दोग्य उपनिषद (3.19.1)
"सर्वं खल्विदं ब्रह्म।"
"निश्चय ही यह सब ब्रह्म है।"
यह मंत्र बताता है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड ब्रह्म का ही विस्तार है।
मुण्डक उपनिषद (1.1.7)
"यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च।
यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति।
यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि।
तथाक्षरात् संभवतीह विश्वम्॥"
"जैसे मकड़ी अपने से जाल बुनती और समेटती है,
जैसे पृथ्वी से औषधियाँ उत्पन्न होती हैं,
जैसे पुरुष से केश और रोम उत्पन्न होते हैं,
वैसे ही अक्षर (ब्रह्म) से यह विश्व उत्पन्न होता है।"
"आत्मन आकाशः संभूतः।
आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः।
अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी।
पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्।
अन्नात् पुरुषः॥"
- तैत्तिरीय उपनिषद 2.1
"आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ।
आकाश से वायु, वायु से अग्नि,
अग्नि से जल, जल से पृथ्वी,
पृथ्वी से औषधियाँ, औषधियों से अन्न,
अन्न से पुरुष (मानव) उत्पन्न हुआ।"
आधुनिक विज्ञान का दृष्टिकोण
बिग बैंग सिद्धांत
आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार, ब्रह्मांड लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले एक अत्यंत सघन और गर्म बिंदु (सिंगुलैरिटी) से विस्फोट के साथ अस्तित्व में आया। इसके बाद यह लगातार फैल रहा है।
विज्ञान और सनातन: ब्रह्मांड उत्पत्ति
| विषय | आधुनिक विज्ञान | सनातन दर्शन |
|---|---|---|
| प्रारंभिक अवस्था | सिंगुलैरिटी, अत्यंत सघन बिंदु | हिरण्यगर्भ, स्वर्ण अंडे के रूप में ब्रह्मांड |
| उत्पत्ति प्रक्रिया | बिग बैंग विस्फोट और विस्तार | ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रचना, सृष्टि चक्र |
| ब्रह्मांड आयु | 13.8 अरब वर्ष (एक बार की उत्पत्ति) | अनादि और अनंत, चक्रीय सृष्टि |
| ब्रह्मांड संरचना | आकाशगंगाएँ, तारे, ग्रह, कृष्ण विवर | लोक (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) |
| भविष्य | ताप मृत्यु, बिग क्रंच या अनंत विस्तार | प्रलय (संहार) और पुनः सृष्टि |
रोचक बात यह है कि हाल के वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि ब्रह्मांड चक्रीय हो सकता है। कुछ वैज्ञानिक "साइक्लिक यूनिवर्स" थ्योरी प्रस्तुत करते हैं, जो सनातन के सृष्टि चक्र से मिलती-जुलती है।
सनातन के विभिन्न दर्शनों में ब्रह्मांड उत्पत्ति
सांख्य दर्शन
प्रकृति (पदार्थ) और पुरुष (चेतना) के संयोग से सृष्टि। प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) के संतुलन से सृष्टि प्रकट होती है।
वैशेषिक दर्शन
परमाणु सिद्धांत। सृष्टि अत्यंत सूक्ष्म अविभाज्य परमाणुओं के संयोग से बनी है। यह आधुनिक अणु सिद्धांत से मिलता-जुलता है।
अद्वैत वेदांत
ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। ब्रह्म ने माया के द्वारा स्वयं को ब्रह्मांड के रूप में प्रकट किया। सृष्टि ब्रह्म का ही विस्तार है।
योग दर्शन
ईश्वर (विशेष पुरुष) के संकल्प से सृष्टि। ईश्वर प्रकृति को प्रेरित करते हैं, जिससे सृष्टि प्रकट होती है।
सृष्टि प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन
पुराणों के अनुसार सृष्टि क्रम
विष्णु पुराण, भागवत पुराण आदि में सृष्टि प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन है:
- महत् तत्त्व: बुद्धि या महान तत्व का प्रकट होना
- अहंकार: अहं भाव का उदय (सात्विक, राजसिक, तामसिक)
- पंच तन्मात्राएँ: शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध के सूक्ष्म तत्व
- पंच महाभूत: आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी
- इन्द्रियाँ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ
- मन: अंतर्मन का निर्माण
- ब्रह्माण्ड: सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना
कल्प और मन्वन्तर
सनातन समय गणना के अनुसार:
- 1 कल्प = 4.32 अरब वर्ष (ब्रह्मा का एक दिन)
- 1 मन्वन्तर = 30.84 करोड़ वर्ष
- वर्तमान कल्प: श्वेतवाराह कल्प
- वर्तमान मन्वन्तर: वैवस्वत मन्वन्तर (7वाँ)
- वर्तमान युग: कलियुग (28वें चतुर्युगी का चौथा युग)
ब्रह्मांडीय चक्र: सृष्टि, स्थिति और संहार
सृष्टि
ब्रह्मा द्वारा ब्रह्मांड की रचना। ब्रह्मा के दिन में होती है।
स्थिति
विष्णु द्वारा ब्रह्मांड का पालन। ब्रह्मांड का विस्तार और विकास।
संहार
शिव द्वारा ब्रह्मांड का लय। ब्रह्मा की रात में होता है।
एक कल्प (ब्रह्मा का एक दिन) के अंत में प्रलय होता है। ब्रह्मा की रात के बाद पुनः नया कल्प (नया दिन) शुरू होता है। यह चक्र अनंत काल से चल रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- विज्ञान: वर्तमान ब्रह्मांड चक्र की आयु 13.8 अरब वर्ष बताता है
- सनातन: सम्पूर्ण सृष्टि चक्र (अनंत चक्रों) की बात करता है
- तुलना: सनातन के अनुसार 1 कल्प = 4.32 अरब वर्ष। वर्तमान ब्रह्मांड इसी कल्प का हिस्सा है।
- महत्वपूर्ण: सनातन समय गणना चक्रीय है, जबकि विज्ञान रेखीय समय मानता है
- हिरण्यगर्भ: स्वर्ण अंडा - अत्यंत सघन, ऊर्जा से भरपूर प्रारंभिक अवस्था
- बिग बैंग: सिंगुलैरिटी - अत्यंत सघन और गर्म प्रारंभिक बिंदु
- विस्तार: दोनों में ब्रह्मांड के विस्तार की अवधारणा
- तापमान: हिरण्यगर्भ "तेजोमय" (तेज से भरपूर), बिग बैंग अत्यंत उच्च तापमान
- विनम्रता: ब्रह्मांड की विशालता का बोध होने पर अहंकार समाप्त होता है
- धैर्य: सृष्टि चक्र के अनंत समय के सामने हमारी समस्याएँ क्षणभंगुर लगती हैं
- पर्यावरण संरक्षण: ब्रह्मांड के अंग होने के नाते प्रकृति के प्रति सम्मान बढ़ता है
- आध्यात्मिक विकास: ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझने से आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ते हैं
- वैज्ञानिक सोच: प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से संतुलित दृष्टिकोण विकसित होता है
- कृष्ण विवर (ब्लैक होल): "विश्व ग्रास" या "महा ग्रास" के रूप में वर्णन जो सब कुछ निगल जाता है
- अदृश्य पदार्थ (डार्क मैटर): "अव्यक्त प्रकृति" या "सूक्ष्म तत्व" जो दिखाई नहीं देता पर प्रभाव डालता है
- डार्क एनर्जी: "प्राण" या "चैतन्य शक्ति" जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है
- मल्टीवर्स: "अनेक लोक" और "ब्रह्मांडों के समूह" की अवधारणा
- स्ट्रिंग थ्योरी: "तन्तु" (धागे) के रूप में ऊर्जा के सूत्रों का वर्णन
- ऋग्वेद (10.90 - पुरुषसूक्त, 10.121 - हिरण्यगर्भ सूक्त)
- विष्णु पुराण (भाग 1 - सृष्टि खण्ड)
- भागवत पुराण (स्कन्ध 3 - सृष्टि वर्णन)
- सांख्य कारिका - ईश्वर कृष्ण
- वैशेषिक सूत्र - कणाद
- ब्रह्म सूत्र - वेद व्यास
- "दि साइंटिफिक एज ऑफ वेदास" - सुबाष काक
- "हिन्दूज्म एण्ड कोस्मोलॉजी" - रमेश एन. पटेल
- "वैदिक फिजिक्स" - के.एस. कृष्णन
- रूपक समझें: ग्रंथों के रूपक और प्रतीकों को शाब्दिक अर्थ न दें
- संदर्भ समझें: किसी एक श्लोक को संपूर्ण संदर्भ से अलग न समझें
- विज्ञान से तुलना: दोनों को एक-दूसरे का विरोधी न मानें, पूरक मानें
- व्यावहारिक दृष्टि: ज्ञान को केवल बौद्धिक खेल न बनाएँ, आचरण में लाएँ
- सही स्रोत: प्रामाणिक ग्रंथों और विद्वानों की व्याख्या ही पढ़ें
- स्वयं सोचें: अन्धानुकरण न करें, स्वयं चिंतन और मनन करें
प्रायोगिक ध्यान: ब्रह्मांड चेतना का अनुभव
विराट स्वरूप का ध्यान
आसन और प्रारंभ
सुखासन में बैठें। शरीर को ढीला छोड़ दें। आँखें बंद करें। 5 मिनट श्वास पर ध्यान केंद्रित करें।
सूक्ष्म से स्थूल की यात्रा
अपने शरीर के अणु-परमाणुओं से प्रारंभ करें। फिर कमरे, भवन, शहर, देश, पृथ्वी की कल्पना करें।
सौर मंडल और आकाशगंगा
पृथ्वी से बाहर निकलें। सूर्य, ग्रहों, सौर मंडल को देखें। फिर सम्पूर्ण आकाशगंगा को कल्पना में लाएँ।
ब्रह्मांड का विस्तार
अनेक आकाशगंगाओं, तारा समूहों, निहारिकाओं को देखें। ब्रह्मांड के विस्तार को अनुभव करें।
विराट स्वरूप का ध्यान
कल्पना करें कि यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक विराट पुरुष का रूप है। आप उसी विराट पुरुष का अंश हैं।
एकत्व का अनुभव
अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को विराट चेतना में विलीन होते हुए अनुभव करें। "अहं ब्रह्मास्मि" का भाव जाग्रत करें।
अंतिम सत्य
ब्रह्मांड की उत्पत्ति का रहस्य अंततः हमें अपने स्वयं के अस्तित्व के रहस्य की ओर ले जाता है। जब हम समझते हैं कि:
"यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड ब्रह्म का विस्तार है
और मैं ब्रह्म हूँ
तब मैं और ब्रह्मांड एक हो जाते हैं
देखने वाला, देखी जाने वाली वस्तु
और देखने की क्रिया
सब एक ही सत्य के विभिन्न पहलू हैं
यही है ब्रह्मांड उत्पत्ति का परम रहस्य।"
आज से ही शुरू करें
ब्रह्मांड के रहस्य को समझने के लिए प्रतिदिन कुछ समय ध्यान और स्वाध्याय को दें। अपने वास्तविक स्वरूप को जानना ही मानव जीवन का सर्वोत्तम उपयोग है।
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