सृष्टि से पहले क्या था? शून्य या चेतना?
सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व की अवस्था का रहस्य - सनातन दर्शन और आधुनिक विज्ञान के अनुसार
मानव बुद्धि के लिए सबसे गहन और चुनौतीपूर्ण प्रश्नों में से एक है: "सृष्टि से पहले क्या था?"। यदि ब्रह्मांड का अस्तित्व है, तो उससे पहले क्या था? क्या पूर्ण शून्य था? अंधकार था? या कुछ और? सनातन दर्शन इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए हज़ारों वर्ष पूर्व ही गहन चिंतन कर चुका है।
"नासदासीन नो सदासीत तदानीं नासीद्रजो नो व्योमापरो यत्।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥"
- ऋग्वेद 10.129.1
"न तब असत् था, न सत् था। न तब वायु थी, न आकाश।
क्या था? कहाँ था? किसके आश्रय में?
क्या गहन और गंभीर जल था?"
मूल प्रश्न: सृष्टि से पहले?
भौतिक विज्ञान का प्रश्न
बिग बैंग से पहले क्या था? समय और स्थान की उत्पत्ति से पूर्व की स्थिति क्या थी?
दार्शनिक प्रश्न
अस्तित्व से पहले क्या था? क्या "कुछ नहीं" भी एक प्रकार का "कुछ" है?
आध्यात्मिक प्रश्न
यदि सृष्टि परमात्मा ने बनाई, तो परमात्मा कहाँ से आया? परमात्मा से पहले क्या था?
सनातन दर्शन इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक साथ देता है: "ब्रह्म"। ब्रह्म ही वह मूल तत्व है जो सृष्टि से पहले भी था, सृष्टि के दौरान भी है, और सृष्टि के बाद भी रहेगा।
सनातन दर्शन का दृष्टिकोण
वेदों में वर्णन
ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (10.129) में सृष्टि से पूर्व की अवस्था का विस्तृत वर्णन है। इसमें कहा गया है कि सृष्टि से पहले न सत् था, न असत्। न मृत्यु थी, न अमरता। न दिन था, न रात। केवल वह एक तत्व था जो बिना श्वास के श्वास ले रहा था।
अव्यक्त
अप्रकट, गुणरहित, रूपहीन अवस्था जो सृष्टि से पूर्व थी
निर्गुण ब्रह्म
गुणों से रहित, निराकार, शुद्ध चेतना जो सभी का आधार है
सत्-असत् से परे
जो अस्तित्व और अनस्तित्व दोनों की सीमाओं से परे है
माण्डूक्य उपनिषद में इस अवस्था को "तुरीय" कहा गया है - चौथा अवस्था जो जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे है। यह शुद्ध चेतना की अवस्था है, जहाँ कोई द्वैत नहीं, केवल एकत्व है।
उपनिषदों में वर्णन
छान्दोग्य उपनिषद (6.2.1)
"सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।"
"हे प्रिय, आदि में केवल सत् (अस्तित्व) ही था, एकमात्र, द्वितीयरहित।"
तैत्तिरीय उपनिषद (2.7)
"असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत।"
"आदि में असत् (अनस्तित्व) था। उसी से सत् (अस्तित्व) उत्पन्न हुआ।"
"यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते।
येन जातानि जीवन्ति।
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
तद्ब्रह्म तद्विजिज्ञासस्व॥"
- तैत्तिरीय उपनिषद 3.1
"जिससे ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं,
जिससे जन्म लेकर जीवित रहते हैं,
जिसमें प्रवेश करते हैं, वह ब्रह्म है,
उसे जानने की इच्छा करो।"
आधुनिक विज्ञान का दृष्टिकोण
बिग बैंग सिद्धांत
आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार, हमारा ब्रह्मांड लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले एक अत्यंत सघन और गर्म बिंदु से विस्फोट के साथ अस्तित्व में आया। परन्तु बिग बैंग से पहले क्या था? यह प्रश्न विज्ञान के लिए अभी भी एक रहस्य है।
विज्ञान और दर्शन: सृष्टि-पूर्व अवस्था
| विषय | आधुनिक विज्ञान | सनातन दर्शन |
|---|---|---|
| सृष्टि-पूर्व अवस्था | अज्ञात, सिंगुलैरिटी, क्वांटम उतार-चढ़ाव | ब्रह्म, निर्गुण निराकार, अव्यक्त प्रकृति |
| समय की उत्पत्ति | बिग बैंग के साथ समय की शुरुआत | ब्रह्म कालातीत, समय ब्रह्म की माया है |
| स्थान की उत्पत्ति | बिग बैंग के साथ स्थान का विस्तार | ब्रह्म सर्वव्यापी, स्थान ब्रह्म में है |
| ऊर्जा/चेतना | क्वांटम ऊर्जा क्षेत्र, शून्य-बिंदु ऊर्जा | चित् (चेतना), सत् (अस्तित्व), आनन्द |
| विधि | गणितीय मॉडल, प्रयोग, अवलोकन | अनुभव, ध्यान, आत्म-साक्षात्कार |
रोचक बात यह है कि आधुनिक क्वांटम भौतिकी भी मानती है कि पूर्ण शून्य भी "शून्य" नहीं है। शून्य-बिंदु ऊर्जा और क्वांटम उतार-चढ़ाव के कारण निर्वात (वैक्यूम) भी ऊर्जा से भरा हुआ है। यह सनातन के "ब्रह्म" की अवधारणा के समान है।
विभिन्न दार्शनिक मत
शून्यवाद (नास्तिकवाद)
सृष्टि से पहले कुछ नहीं था। शून्य था। सृष्टि स्वतः ही शून्य से उत्पन्न हुई।
सृष्टिवाद (आस्तिकवाद)
सृष्टि से पहले ईश्वर था। ईश्वर ने सृष्टि की रचना की। ईश्वर ही सृष्टि का कारण है।
अद्वैत वेदांत
सृष्टि से पहले ब्रह्म था। ब्रह्म ने माया के द्वारा स्वयं को सृष्टि के रूप में प्रकट किया। सृष्टि ब्रह्म का ही रूपांतरण है।
सांख्य दर्शन
सृष्टि से पहले प्रकृति (पदार्थ) और पुरुष (चेतना) थे। प्रकृति संतुलित अवस्था में थी। पुरुष के संयोग से सृष्टि प्रकट हुई।
आदि शंकराचार्य का दृष्टिकोण
आदि शंकराचार्य ने "विवेकचूड़ामणि" में स्पष्ट किया है कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। सृष्टि माया है, जो ब्रह्म में ही प्रकट और लीन होती है।
"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।"
- विवेकचूड़ामणि 20
"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है,
जीव ब्रह्म ही है, अन्य कुछ नहीं।"
माया का स्वरूप
शंकराचार्य के अनुसार, माया दो शक्तियों से युक्त है:
- आवरण शक्ति: ब्रह्म के स्वरूप को ढक लेती है
- विक्षेप शक्ति: विविधता और बहुलता की भ्रांति उत्पन्न करती है
सृष्टि से पहले माया की विक्षेप शक्ति सुप्त अवस्था में थी, केवल आवरण शक्ति सक्रिय थी। इसीलिए ब्रह्म अव्यक्त, निर्गुण और निराकार था।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- समय से परे है (कालातीत)
- स्थान से परे है (सर्वव्यापी)
- कारण-कार्य से परे है (स्वयंभू)
- शून्य-बिंदु ऊर्जा: पूर्ण शून्य तापमान पर भी क्वांटम क्षेत्रों में ऊर्जा रहती है
- क्वांटम उतार-चढ़ाव: निर्वात में कण-प्रतिकण जोड़े उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं
- हाइग्स क्षेत्र: पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त ऊर्जा क्षेत्र जो पदार्थ को द्रव्यमान देता है
- अस्तित्वगत संकट से मुक्ति: जब आप जान जाते हैं कि आपका सच्चा स्वरूप ब्रह्म है, तो मृत्यु का भय समाप्त होता है
- भौतिकवाद से ऊपर उठना: सृष्टि की नश्वरता का बोध होने पर भौतिक वस्तुओं का मोह कम होता है
- आंतरिक शांति: "मैं शरीर हूँ" के भ्रम से मुक्ति मिलने पर स्थायी शांति का अनुभव होता है
- एकत्व का अनुभव: सभी प्राणियों में एक ही चेतना देखने से प्रेम और करुणा का विकास होता है
- जीवन का सही उद्देश्य: आत्म-साक्षात्कार जीवन का परम लक्ष्य बन जाता है
- ब्रह्म का अंश: हम ब्रह्म के अंश नहीं, बल्कि पूर्ण ब्रह्म ही हैं (अहं ब्रह्मास्मि)
- दिव्य अनुभव: मानव जीवन दुर्लभ अवसर है जिसमें ब्रह्म को जाना जा सकता है
- सृजनात्मक शक्ति: हमारे भीतर ही वही सृजनात्मक शक्ति है जिसने सम्पूर्ण ब्रह्मांड रचा
- उद्देश्यपूर्ण जीवन: जब हम अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेते हैं, तो जीवन पूर्णतः उद्देश्यपूर्ण हो जाता है
- ऋग्वेद का नासदीय सूक्त (10.129)
- माण्डूक्य उपनिषद (ॐ और तुरीय अवस्था)
- तैत्तिरीय उपनिषद (कोश सिद्धांत)
- विवेकचूड़ामणि - आदि शंकराचार्य
- अष्टावक्र गीता
- योग वासिष्ठ
- "दि टाओ ऑफ फिजिक्स" - फ्रिटजोफ काप्रा
- "दि डिवाइन मैट्रिक्स" - ग्रेग ब्रेडन
- "दि सेल्फ-अवेयर यूनिवर्स" - अमित गोस्वामी
- बौद्धिकता से बचें: केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहें, अनुभव पर जोर दें
- अहंकार न पालें: "मैं ज्ञानी हो गया" का भाव सबसे बड़ी बाधा है
- क्रमिक प्रगति: एकदम से गहन विषयों में न जाएँ, धीरे-धीरे आगे बढ़ें
- गुरु का सहारा: जहाँ संभव हो, किसी योग्य गुरु/मार्गदर्शक का सहारा लें
- दैनिक जिम्मेदारियाँ: आध्यात्मिक साधना और दैनिक कर्तव्यों में संतुलन बनाए रखें
- विवेक बनाए रखें: अंधविश्वास और कुरीतियों से बचें, विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाएँ
प्रायोगिक ध्यान: सृष्टि-पूर्व अवस्था का अनुभव
तुरीय अवस्था का ध्यान
आसन और प्रारंभ
सुखासन या सिद्धासन में बैठें। शरीर को ढीला छोड़ दें। आँखें बंद करें। 5 मिनट श्वास पर ध्यान केंद्रित करें।
ॐ का उच्चारण
मन ही मन ॐ का उच्चारण करें। ॐ के चार भागों पर ध्यान दें: अ, उ, म, और अर्धमात्रा (मौन)।
भौतिक शरीर से पृथकता
कहें: "यह मेरा शरीर है, पर मैं शरीर नहीं हूँ। मैं शरीर का स्वामी हूँ, शरीर मेरा उपकरण है।"
सूक्ष्म शरीर से पृथकता
कहें: "ये मेरे विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ हैं, पर मैं इनसे अलग हूँ। मैं इनका साक्षी हूँ।"
कारण शरीर से पृथकता
कहें: "यह मेरा अहंकार, पहचान, संस्कार है, पर मैं इनसे परे हूँ। मैं शुद्ध चेतना हूँ।"
तुरीय अवस्था
सभी विचारों, भावनाओं, पहचानों से मुक्त होकर शुद्ध चेतना में स्थित रहें। यही सृष्टि-पूर्व अवस्था का अनुभव है।
अंतिम सत्य
सृष्टि से पहले क्या था? इस प्रश्न का उत्तर है: "वही जो अभी भी है और सदैव रहेगा - ब्रह्म।" सृष्टि ब्रह्म का ही खेल है, माया का विस्तार है। जब हम अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेते हैं, तब हमें समझ आता है कि:
"न मैं सृष्टि से पहले था
न मैं सृष्टि के दौरान हूँ
न मैं सृष्टि के बाद रहूंगा
क्योंकि मैं सृष्टि से परे हूँ
मैं वह शुद्ध चेतना हूँ
जिसमें सृष्टि आती-जाती है
जैसे सपना जागृत में।"
आज से ही शुरू करें
सृष्टि के रहस्य को समझने के लिए प्रतिदिन कुछ समय ध्यान और स्वाध्याय को दें। अपने वास्तविक स्वरूप को जानना ही मानव जीवन का सर्वोत्तम उपयोग है।
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