सब कुछ कहाँ से शुरू हुआ? मैं कौन हूँ?
अस्तित्व की उत्पत्ति और आत्म-पहचान का अनंत रहस्य - सनातन दर्शन से आधुनिक विज्ञान तक
मानव सभ्यता के आरम्भ से ही दो प्रश्न मानव मन को सबसे अधिक विचलित करते रहे हैं: "सब कुछ कहाँ से शुरू हुआ?" और "मैं कौन हूँ?"। ये दोनों प्रश्न अस्तित्व के मूल तक पहुँचने के प्रयास हैं - बाह्य ब्रह्मांड की खोज और आंतरिक आत्मा की पहचान।
"अहं ब्रह्मास्मि" - बृहदारण्यक उपनिषद (1.4.10)
"मैं ब्रह्म हूँ।" - यह वाक्य आत्म-पहचान का सार है।
दो मौलिक प्रश्न
सब कुछ कहाँ से शुरू हुआ?
बाह्य प्रश्न: ब्रह्मांड, सृष्टि, अस्तित्व की उत्पत्ति का रहस्य
मैं कौन हूँ?
आंतरिक प्रश्न: आत्मा, चेतना, स्वयं की वास्तविक प्रकृति की खोज
आश्चर्य की बात यह है कि सनातन दर्शन में ये दोनों प्रश्न एक ही उत्तर की ओर ले जाते हैं। जब हम "मैं कौन हूँ?" का उत्तर खोजते हैं, तो हमें "सब कुछ कहाँ से शुरू हुआ?" का उत्तर मिल जाता है, और इसके विपरीत।
सनातन दर्शन का दृष्टिकोण
वेदांत की शिक्षा
वेदांत दर्शन के अनुसार, ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। ब्रह्म निर्गुण (गुणों से रहित), निराकार (रूपहीन) और अनंत है। इसी ब्रह्म से सम्पूर्ण सृष्टि प्रकट हुई है।
सत्
अस्तित्व - जो सदैव है, कभी नहीं नहीं था
चित्
चेतना - जानने की शक्ति, बोध की क्षमता
आनन्द
आनंद - शुद्ध सुख, दुख से रहित आत्मिक प्रसन्नता
"तत् त्वम् असि" - छान्दोग्य उपनिषद का यह महावाक्य कहता है: "वह तू ही है।" अर्थात, जो परम सत्य (ब्रह्म) है, वही तुम हो। यहाँ "मैं" और "सब कुछ" के बीच का भेद मिट जाता है।
आधुनिक विज्ञान का दृष्टिकोण
ब्रह्मांड की उत्पत्ति
आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार, हमारा ब्रह्मांड लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले बिग बैंग (महाविस्फोट) से अस्तित्व में आया। एक अत्यंत सघन और गर्म बिंदु से विस्फोट होकर ब्रह्मांड का विस्तार शुरू हुआ।
विज्ञान और दर्शन: तुलना
| विषय | आधुनिक विज्ञान | सनातन दर्शन |
|---|---|---|
| उत्पत्ति | बिग बैंग (13.8 अरब वर्ष पूर्व) | ब्रह्म से सृष्टि का प्रकटीकरण |
| मूल तत्व | क्वांटम क्षेत्र, ऊर्जा, पदार्थ | चेतना (चित्), अस्तित्व (सत्) |
| "मैं" की परिभाषा | मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, डीएनए | आत्मा (आत्मन्), शुद्ध चेतना |
| लक्ष्य | भौतिक नियमों की खोज | आत्म-साक्षात्कार, मोक्ष |
| पद्धति | प्रयोग, अवलोकन, विश्लेषण | ध्यान, आत्म-अनुशासन, ज्ञान |
आत्म-पहचान की यात्रा
शरीर की पहचान
"मैं शरीर हूँ" - यह भ्रम जन्म से शुरू होता है। हम स्वयं को नाम, रूप, लिंग, उम्र से जोड़कर पहचानते हैं।
मन की पहचान
"मैं मन हूँ" - विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ, इच्छाएँ, भय... इन सबको हम स्वयं मानने लगते हैं।
बुद्धि की पहचान
"मैं बुद्धि हूँ" - तर्क, विवेक, निर्णय लेने की क्षमता को स्वयं समझना।
साक्षी भाव
"मैं साक्षी हूँ" - शरीर, मन, बुद्धि का साक्षी मात्र होना। यहाँ "मैं" और "मेरा" का भेद स्पष्ट होता है।
आत्म-साक्षात्कार
"अहं ब्रह्मास्मि" - "मैं ब्रह्म हूँ।" यह परम सत्य का बोध है, जहाँ व्यक्तिगत और सार्वभौमिक एक हो जाते हैं।
व्यावहारिक दृष्टिकोण: कैसे जानें "मैं कौन हूँ?"
स्वाध्याय (Self-Enquiry) की विधि
आदि शंकराचार्य और रमण महर्षि ने "मैं कौन हूँ?" के प्रश्न को आत्म-ज्ञान का सबसे शक्तिशाली साधन बताया है।
- प्रश्न करें: बार-बार अपने आप से पूछें - "मैं कौन हूँ?"
- नकारात्मक उत्तर हटाएँ: "मैं शरीर नहीं हूँ", "मैं मन नहीं हूँ", "मैं विचार नहीं हूँ"
- साक्षी भाव विकसित करें: सभी अनुभवों, विचारों, भावनाओं को देखने वाला बनें
- मौन में ठहरें: जब सभी उत्तर समाप्त हो जाएँ, तब शून्य में रहें
- स्वतः प्रकट होगा सत्य: शुद्ध चेतना स्वयं प्रकट होगी
"न ते रूपं न चाकारो न च प्रत्ययदर्शनम्।
अयमस्मि परं ब्रह्म सर्वभूतेष्ववस्थितम्॥"
- अष्टावक्र गीता
"न तुम्हारा कोई रूप है, न आकार है, न प्रत्यक्ष दर्शन है।
मैं ही परम ब्रह्म हूँ, जो सभी प्राणियों में स्थित है।"
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- अस्तित्वगत संकट समाप्त होता है
- भय, चिंता, अवसाद दूर होते हैं
- सच्ची स्वतंत्रता और आनंद की प्राप्ति होती है
- सम्पूर्ण ब्रह्मांड के साथ एकत्व का अनुभव होता है
आध्यात्मिकता: आंतरिक खोज - चेतना की प्रकृति, आत्मा का स्वरूप, परम सत्य
दोनों एक ही सत्य के अलग-अलग पहलू हैं। आधुनिक क्वांटम भौतिकी अब स्वीकार रही है कि चेतना ही मूलभूत वास्तविकता है। प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी सर जेम्स जीन्स ने कहा: "ब्रह्मांड एक महान विचार की तरह प्रतीत होता है।"
- प्रतिदिन 10-15 मिनट "मैं कौन हूँ?" का चिंतन करें
- ध्यान का अभ्यास करें - विचारों को देखना सीखें
- अहंकार को कम करने का प्रयास करें
- सरल जीवन जिएँ, आवश्यकताएँ कम करें
- सत्संग करें - ज्ञानी व्यक्तियों का सान्निध्य लाभदायक है
- तनाव प्रबंधन: जब आप जान जाते हैं कि आप विचार नहीं हैं, तो विचारों से पीड़ित नहीं होते
- संबंधों में सुधार: दूसरों में भी वही आत्मा देखने से क्रोध, ईर्ष्या समाप्त होती है
- निर्णय क्षमता: अहंकार के प्रभाव से मुक्त होकर बेहतर निर्णय ले सकते हैं
- सृजनात्मकता: शुद्ध चेतना से जुड़ने पर रचनात्मकता प्रवाहित होती है
- आंतरिक शांति: बाह्य परिस्थितियों से स्वतंत्र, स्थायी शांति का अनुभव
- अष्टावक्र गीता
- पतंजलि योग सूत्र
- रमण महर्षि की "मैं कौन हूँ?"
- उपनिषद (ईश, कठ, केन, मुण्डक)
- भगवद्गीता (अध्याय 2, 13, 14 विशेष)
- विवेकचूड़ामणि - आदि शंकराचार्य
- ब्रह्म सूत्र
- माण्डूक्य उपनिषद (ॐ का रहस्य)
- अद्वैत वेदांत के ग्रंथ
- अहंकार: "मैं ज्ञानी हो गया" का भाव सबसे बड़ी बाधा है
- बौद्धिकता: केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित रहना
- अधीरता: तुरंत परिणाम की अपेक्षा
- अनुशासनहीनता: नियमित अभ्यास न करना
- किसी योग्य गुरु/मार्गदर्शक का सहारा लें
- अति उत्साह में शारीरिक या मानसिक दबाव न डालें
- धीरे-धीरे आगे बढ़ें, प्रकृति के विरुद्ध न जाएँ
- दैनिक जिम्मेदारियों से भागें नहीं, बल्कि उन्हें साधना बनाएँ
प्रायोगिक अभ्यास
7-दिवसीय आत्म-खोज कार्यक्रम
दिन 1: प्रश्न का बीज रोपण
दिन में 5 बार ध्यानपूर्वक पूछें: "मैं कौन हूँ?" किसी उत्तर की अपेक्षा न करें, केवल प्रश्न करें।
दिन 2: शरीर से पहचान तोड़ना
दर्पण में देखकर कहें: "यह मेरा शरीर है, पर मैं शरीर नहीं हूँ। मैं इस शरीर का स्वामी हूँ।"
दिन 3: विचारों से पहचान तोड़ना
विचार आते-जाते रहें, उन्हें देखें और कहें: "ये मेरे विचार हैं, पर मैं विचार नहीं हूँ। मैं विचारों का साक्षी हूँ।"
दिन 4: भावनाओं से पहचान तोड़ना
क्रोध, खुशी, दुख आने पर कहें: "यह मेरी भावना है, पर मैं भावना नहीं हूँ। मैं भावनाओं का अनुभव करने वाला हूँ।"
दिन 5: साक्षी भाव का अभ्यास
पूरे दिन अपने को सभी क्रियाओं, विचारों, भावनाओं का साक्षी मात्र मानें। "मैं देख रहा हूँ, सुन रहा हूँ, अनुभव कर रहा हूँ।"
दिन 6: मौन का अभ्यास
2-3 घंटे का मौन रखें। बोलें नहीं, केवल देखें और सुनें। आंतरिक मौन की ओर बढ़ें - विचारों को आने-जाने दें, उनसे न जुड़ें।
दिन 7: एकत्व का अनुभव
प्रकृति में बैठकर सभी वस्तुओं में एक ही चेतना देखने का प्रयास करें। "वृक्ष में वही, पक्षी में वही, मुझमें वही।"
अंतिम प्राप्ति
जब "मैं कौन हूँ?" का उत्तर मिल जाता है, तो "सब कुछ कहाँ से शुरू हुआ?" का प्रश्न स्वतः हल हो जाता है। आप जान जाते हैं कि:
"न मैं जन्मा, न मरूंगा
न मैं आया, न जाऊंगा
मैं तो केवल साक्षी हूँ
इस नाटक का दर्शक हूँ
जो है, सदा से है
और सदा रहेगा।"
आज से ही शुरू करें
आत्म-ज्ञान की यह यात्रा मानव जीवन का सर्वोत्तम उपयोग है। प्रतिदिन कुछ समय "मैं कौन हूँ?" के प्रश्न पर चिंतन करें।
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