सर्वेश्वर कौन हैं?
एक ईश्वर की अवधारणा, सर्वव्यापी स्वरूप और सनातन धर्म में ईश्वर का रहस्य
सर्वेश्वर कौन हैं? क्या सनातन धर्म में अनेक देवता हैं या एक ही ईश्वर? 'सर्वेश्वर' का क्या अर्थ है? सनातन धर्म में 'सर्वेश्वर' शब्द का अर्थ है - सबके ईश्वर, संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी। यद्यपि हम अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, पर मूलतः सनातन दर्शन एक ही परम सत्ता को मानता है। ऋग्वेद का सूत्र है - "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (एक ही सत्य को विद्वान अनेक नामों से पुकारते हैं)। आइए, सर्वेश्वर के इस एकत्व के रहस्य को समझें।
"एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।"
(एक ही सत्य को विद्वान अनेक नामों से पुकारते हैं - अग्नि, यम, मातरिश्वा कहते हैं।) - ऋग्वेद (1.164.46)
सर्वेश्वर का स्वरूप: परम सत्ता की परिभाषा
सर्वेश्वर के प्रमुख गुण
नित्य (Eternal)
सर्वेश्वर का न तो कोई आदि है, न अंत। वे सदा से थे और सदा रहेंगे। वे समय से परे हैं।
अविनाशी (Indestructible)
सर्वेश्वर को कोई नष्ट नहीं कर सकता। वे सभी भौतिक तत्वों से परे हैं।
सच्चिदानंद
सर्वेश्वर का स्वरूप सत् (अस्तित्व), चित् (ज्ञान) और आनंद (सुख) है।
निर्लेप (Impartial)
सर्वेश्वर किसी के प्रति विशेष पक्षपात नहीं रखते। वे सब पर समान दृष्टि रखते हैं।
साक्षी (Witness)
सर्वेश्वर सबके कर्मों के साक्षी हैं। वे बिना हस्तक्षेप के सब कुछ देखते हैं।
अंतर्यामी (Inner Controller)
सर्वेश्वर सबके हृदय में स्थित हैं और सबका मार्गदर्शन करते हैं।
एक ईश्वर, अनेक नाम: सनातन धर्म का एकेश्वरवाद
वेदों में एक ईश्वर
वेदों में स्पष्ट कहा गया है - "एकमेवाद्वितीयम्" (एक ही है, दूसरा नहीं)। चारों वेद एक ही परम सत्ता की महिमा का गान करते हैं, चाहे उन्हें अग्नि कहें, इंद्र कहें या वरुण। यह एकेश्वरवाद की स्पष्ट घोषणा है।
उपनिषदों में ब्रह्म
उपनिषदों में उस एक परम सत्ता को 'ब्रह्म' कहा गया है। "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" - सब कुछ ब्रह्म ही है। यह अद्वैत दर्शन का मूल मंत्र है। ब्रह्म ही सर्वेश्वर हैं।
गीता में परमात्मा
गीता में कृष्ण स्वयं को परमात्मा कहते हैं - "मत्तः परतरं नान्यत्" (मुझसे परे कुछ भी नहीं है)। वे सभी देवताओं के देवता हैं।
पुराणों में त्रिमूर्ति
पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु, शिव - तीनों एक ही परम सत्ता के तीन रूप माने गए हैं। उनमें कोई भेद नहीं है। वे एक ही सर्वेश्वर के विभिन्न कार्यों के प्रतीक हैं।
विभिन्न परंपराओं में एक ईश्वर की अवधारणा
| परंपरा/दर्शन | एक ईश्वर का स्वरूप | विशेषता |
|---|---|---|
| निर्गुण ब्रह्म - जो सगुण रूप में ईश्वर कहलाता है | जीव और ब्रह्म में अभेद, "अहं ब्रह्मास्मि" | |
| विशिष्टाद्वैत | सगुण साकार नारायण/विष्णु | जीव और जगत ईश्वर के शरीर हैं |
| शैव दर्शन | शिव सर्वोच्च परमात्मा | शिव ही सृष्टि, स्थिति और संहार के कर्ता |
| शाक्त दर्शन | आदि शक्ति/देवी सर्वोच्च | शक्ति ही ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा |
| इस्लाम | अल्लाह (निराकार, एक, अद्वितीय) | कोई साझी नहीं, "ला इलाहा इल्लल्लाह" |
| ईसाई धर्म | ईश्वर पिता (त्रिएक - पिता, पुत्र, पवित्र आत्मा) | ईश्वर प्रेम है |
सर्वेश्वर की उपासना कैसे करें?
निर्गुण उपासना
ध्यान और ज्ञान के माध्यम से निराकार ब्रह्म की अनुभूति। "सोहम्", "अहं ब्रह्मास्मि" जैसे महावाक्यों का चिंतन। यह ज्ञान मार्ग है।
सगुण उपासना
किसी एक साकार रूप (राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, विष्णु) की भक्ति। मूर्ति पूजा, भजन-कीर्तन, मंत्र जप। यह भक्ति मार्ग है।
योग साधना
ध्यान और प्राणायाम के माध्यम से चेतना का विस्तार और परमात्मा से जुड़ाव। राज योग, कुंडलिनी योग।
नाम जप
"ॐ", "राम", "कृष्ण", "शिव", "हरे कृष्ण" - किसी भी नाम का निरंतर जप करें। नाम और नामी में कोई अंतर नहीं।
शास्त्रों में सर्वेश्वर का वर्णन
(एक ही सत्य को विद्वान अनेक नामों से पुकारते हैं - अग्नि, यम, मातरिश्वा कहते हैं।)
(यह सब कुछ ब्रह्म ही है।)
(एक ही है, दूसरा नहीं।)
(ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित हैं।)
(संपूर्ण विश्व एक परिवार है।)
(सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार हमारे पास आएँ।)
सामान्य भ्रांतियाँ: क्या सनातन धर्म बहुदेववादी है?
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सर्वेश्वर को अपने जीवन में कैसे अनुभव करें?
सर्वेश्वर साक्षात्कार के व्यावहारिक उपाय:
नियमित ध्यान करें: प्रतिदिन कम से कम 15-20 मिनट ध्यान करें। 'ॐ' का जप करें। अपने भीतर उस परम चेतना को अनुभव करें।
सभी में एक ही ईश्वर को देखें: सभी प्राणियों में, सभी वस्तुओं में, सभी परिस्थितियों में उस एक सर्वेश्वर को देखने का अभ्यास करें।
नाम जप करें: किसी भी दिव्य नाम (राम, कृष्ण, शिव, ॐ, हरे कृष्ण) का निरंतर जप करें। नाम और नामी में कोई अंतर नहीं।
सेवा भाव रखें: दूसरों की सेवा को ईश्वर की सेवा समझें। "सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है।"
शास्त्रों का अध्ययन करें: उपनिषद, गीता, रामायण, भागवत का अध्ययन करें। इससे सर्वेश्वर के स्वरूप की समझ बढ़ती है।
सत्संग करें: संतों और ज्ञानियों का सान्निध्य लें। उनके प्रवचन सुनें।
कृतज्ञता रखें: जो कुछ भी है, उसके लिए सर्वेश्वर को धन्यवाद दें। कृतज्ञता सबसे बड़ी साधना है।
एक ही सर्वेश्वर को जानें, सबमें उन्हें देखें
ईश्वर एक है, चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारें। सबमें उसी एक सत्ता को देखना ही सच्चा ज्ञान है।
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