साक्षी भाव: ईश्वर की दृष्टि का रहस्य

ईश्वर का साक्षी स्वरूप, बिना हस्तक्षेप के सब कुछ देखना, और साक्षी भाव की साधना

साक्षी भाव: देखो, पर मत उलझो

साक्षी भाव क्या है? ईश्वर का साक्षी स्वरूप कैसा है? हम साक्षी कैसे बनें? 'साक्षी' शब्द का अर्थ है - गवाह, देखने वाला, जो बिना हस्तक्षेप के केवल देखता है। सनातन दर्शन में ईश्वर को 'साक्षी चेतना' कहा गया है - जो सब कुछ देखता है, पर किसी में उलझता नहीं। जैसे एक चौराहे पर लगा सीसीटीवी कैमरा सबको देखता है, पर उनसे प्रभावित नहीं होता, वैसे ही ईश्वर इस सृष्टि रूपी नाटक को देख रहे हैं। आइए, इस साक्षी भाव के रहस्य को विस्तार से समझें।

उपद्रष्टा अनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः

"उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥"
(इस शरीर में परमात्मा उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता और महेश्वर के रूप में स्थित है।)

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साक्षी का अर्थ: निर्लिप्त द्रष्टा
साक्षी का अर्थ है - जो सब कुछ देखता है, पर किसी चीज़ से लिप्त नहीं होता। जैसे आकाश में बादल आते-जाते हैं, पर आकाश पर कोई असर नहीं पड़ता। वैसे ही साक्षी चेतना पर सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ईश्वर इस संपूर्ण सृष्टि के साक्षी हैं - वे सब कुछ देखते हैं, पर वे न तो सुखी होते हैं, न दुखी। हमारी आत्मा भी स्वभाव से साक्षी है, पर अज्ञान के कारण हम कर्ता-भोक्ता बन जाते हैं। साक्षी भाव की साधना का अर्थ है - अपने मूल स्वरूप को पहचानना, जो केवल देखता है, कुछ नहीं करता।
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गीता में साक्षी स्वरूप
श्रीकृष्ण गीता में अपने साक्षी स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं - "उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः" (मैं इस शरीर में उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता और महेश्वर हूँ)। उपद्रष्टा का अर्थ है - साक्षी, जो पास खड़ा होकर देखता है। वे कहते हैं कि मैं किसी का कुछ नहीं करता, मैं तो केवल साक्षी हूँ। प्रकृति के गुण ही सब कुछ करते हैं। यह बहुत गहरा रहस्य है - ईश्वर होकर भी वे केवल साक्षी हैं, और हमें भी यही सीखना है - कर्म करो, पर साक्षी भाव से, कर्ता बनकर नहीं।
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साक्षी भाव और आत्मा
हमारी आत्मा भी स्वभाव से साक्षी है, पर अज्ञान के कारण हम देह, मन, बुद्धि से तादात्म्य कर लेते हैं। जब हम कहते हैं "मैं दुखी हूँ" - तो यह गलत है। दुख तो मन को होता है, आत्मा को नहीं। आत्मा तो सदा शांत, सदा आनंदमयी, सदा साक्षी है। साक्षी भाव की साधना का अर्थ है - इस देह, मन, बुद्धि से अपने को अलग करना और अपने मूल साक्षी स्वरूप में स्थित होना। जैसे सिनेमा देखते समय हम जानते हैं कि यह फिल्म है, हम उसमें नहीं हैं - वैसे ही जीवन रूपी फिल्म को साक्षी भाव से देखना सीखें। यही आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है।
साक्षी भाव के तीन चरण

प्रथम चरण - जाग्रत साक्षी: हम अपने कार्यों, विचारों, भावनाओं को देखना शुरू करते हैं। जैसे कोई तीसरा व्यक्ति हमारे मन को देख रहा हो।

द्वितीय चरण - स्वप्न साक्षी: ध्यान की गहरी अवस्था में हम सपनों को भी साक्षी भाव से देखने लगते हैं। मन के उतार-चढ़ाव हमें प्रभावित नहीं करते।

तृतीय चरण - तुरीय अवस्था: साक्षी और दृश्य का भेद मिट जाता है। हम स्वयं साक्षी बन जाते हैं। यही मोक्ष की अवस्था है, जहाँ कर्ता, कर्म, क्रिया - तीनों समाप्त हो जाते हैं। केवल चैतन्य शेष रहता है।

साक्षी भाव के लाभ

मानसिक शांति
जब हम साक्षी बन जाते हैं, तो मन के तूफान हमें डिगा नहीं पाते। हर परिस्थिति में शांति बनी रहती है।
तनाव मुक्ति
'यह सब हो रहा है, मैं नहीं कर रहा' - इस भाव से तनाव समाप्त हो जाता है। साक्षी को तनाव नहीं होता।
आसक्ति का त्याग
साक्षी भाव से हम देखते हैं कि सब कुछ बदल रहा है। किसी चीज़ से आसक्ति अपने आप कम हो जाती है।
सही निर्णय
जब हम साक्षी होते हैं, तो भावनाओं में बहते नहीं। स्पष्टता आती है, सही-गलत का पता चलता है।
सहानुभूति, न कि तादात्म्य
साक्षी दूसरों के दुख को समझता है, पर उसमें डूबता नहीं। वह मदद कर सकता है, बिना खुद टूटे।
मुक्ति का मार्ग
साक्षी भाव ही आत्म-साक्षात्कार का सबसे सीधा मार्ग है। ज्ञानी साक्षी बनकर ही जीवन्मुक्त होता है।

शास्त्रों में साक्षी भाव

"उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥"
(इस शरीर में परमात्मा उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता और महेश्वर है।)
- श्रीमद्भगवद्गीता (13.22)
"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥"
(जैसे हवा रहित स्थान में दीपक नहीं हिलता, वैसे ही योगी का मन स्थिर रहता है।)
- गीता (6.19)
"साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च"
(आत्मा साक्षी, चेतन, केवल और निर्गुण है।)
- स्वेताश्वतर उपनिषद्
"निर्लिप्तं साक्षिणं प्राहुः"
(उसे निर्लिप्त साक्षी कहते हैं।)
- वेदांत सार

भोगी, योगी और साक्षी में अंतर

भोगी योगी साक्षी
संसार में उलझा रहता है संसार से भागता है संसार में रहकर भी निर्लिप्त
सुख-दुख से प्रभावित सुख-दुख से बचना चाहता है सुख-दुख को देखता है, प्रभावित नहीं
'मैं करता हूँ' का भाव 'मैं नहीं करता' का भाव 'सब हो रहा है' का भाव
आसक्त विरक्त समता में स्थित
अज्ञानी साधक ज्ञानी

साक्षी भाव कैसे विकसित करें?

ध्यान (मेडिटेशन)

प्रतिदिन ध्यान करें। विचारों को देखें, उनसे लड़ें नहीं, बस देखें। धीरे-धीरे आप विचारों से अलग होने लगेंगे।

शरीर से अलग करके देखना

'मैं यह शरीर नहीं हूँ' - इस भाव का अभ्यास करें। भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी को शरीर में होते हुए देखें।

भावनाओं को देखना

क्रोध आए तो कहें - 'मुझ में क्रोध आ रहा है', 'मैं क्रोधित हूँ' न कहें। भावना और आप अलग हैं।

नाम जप और स्वयं साक्षी

नाम जप करते समय देखें कि कौन जप कर रहा है? शरीर? मन? या कोई और? यह साक्षी को जगाता है।

सबको नाटक मानें

जीवन को एक नाटक मानें। नाटक में सब हो रहा है, पर अभिनेता जानता है कि यह सब असली नहीं।

आकाश की तरह बनें

आकाश पक्षियों को उड़ते देखता है, पर वह न तो पक्षी बनता है, न उनमें उलझता है। वैसे ही बनें।

साक्षी भाव में बाधक कारक:
अहंकार: 'मैं कर रहा हूँ' का भाव साक्षी भाव को नष्ट करता है।
आसक्ति: जहाँ आसक्ति है, वहाँ निर्लिप्तता नहीं हो सकती।
राग-द्वेष: पसंद-नापसंद साक्षी को ढक लेते हैं।
नींद और तमोगुण: जड़ता में साक्षी भाव नहीं जगता।
अत्यधिक सक्रियता: बहुत अधिक कर्मों में उलझे रहने से साक्षी खो जाती है।
विचारों की अधिकता: लगातार सोचते रहने से देखने का समय नहीं मिलता।

साक्षी भाव से जुड़े प्रश्न

क्या साक्षी भाव का अर्थ उदासीनता है?
बिल्कुल नहीं। साक्षी भाव उदासीनता नहीं है, बल्कि सजगता है। उदासीन का अर्थ है - कुछ नहीं करना, कुछ महसूस नहीं करना। साक्षी सब कुछ देखता है, सब कुछ जानता है, पर वह उलझता नहीं। वह कर्म करता है, पर कर्ता नहीं बनता। वह दूसरों की मदद करता है, पर आसक्त नहीं होता। जैसे एक डॉक्टर मरीज का ऑपरेशन करता है - वह पूरी सजगता से करता है, पर मरीज के दर्द में खुद नहीं डूबता। वह करुणा रखता है, पर आसक्त नहीं। साक्षी भाव का अर्थ है - कर्म करो, पर फल की चिंता मत करो। दुनिया में रहो, पर दुनिया का हिस्सा मत बनो। यही सच्ची साधना है।
क्या साक्षी भाव से संसार से भागना जरूरी है?
नहीं, साक्षी भाव संसार में रहते हुए भी विकसित किया जा सकता है। वास्तव में, संसार से भागकर साक्षी भाव नहीं आता। ज्ञानी साक्षी संसार में रहता है, पर संसार उसे छूता नहीं। जैसे कमल के पत्ते पर पानी नहीं टिकता, वैसे ही साक्षी पर संसार का कोई असर नहीं होता। महात्मा गांधी, विवेकानंद, रमण महर्षि - ये सब संसार में रहे, पर साक्षी भाव में। बल्कि संसार की सेवा के लिए साक्षी भाव आवश्यक है। यदि आप दूसरों के दुख में डूब जाएंगे, तो मदद नहीं कर पाएंगे। साक्षी बनकर ही आप सच्ची सेवा कर सकते हैं। इसलिए भागना नहीं, बल्कि निर्लिप्त होकर रहना सीखें।
साक्षी भाव में रहते हुए क्या हम रो सकते हैं, हँस सकते हैं?
हाँ, साक्षी भाव का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं है। साक्षी सब कुछ होने देता है - रोना, हँसना, क्रोध, प्रेम - सब कुछ। पर वह इन भावनाओं से पहचान नहीं रखता। वह जानता है कि ये सब शरीर-मन में हो रहे हैं, मुझमें नहीं। जैसे सिनेमा देखते समय हम रोते या हँसते हैं, पर हम जानते हैं कि यह सब फिल्म है। वैसे ही साक्षी जीवन रूपी फिल्म का आनंद लेता है, पर जानता है कि यह असली नहीं। रामकृष्ण परमहंस रोते थे, हँसते थे, नाचते थे - पर वे हर पल साक्षी थे। भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि उनसे अलग होना सीखें। भावनाओं को आने दें, जाने दें - बस देखते रहें।
क्या साक्षी भाव और आत्म-साक्षात्कार एक हैं?
साक्षी भाव आत्म-साक्षात्कार का एक महत्वपूर्ण चरण है, पर पूर्ण नहीं। प्रारंभ में हम 'साक्षी भाव' का अभ्यास करते हैं - हम देखते हैं, पर उलझते नहीं। यह एक साधना है। जब यह साधना पक्की हो जाती है, तो हमें पता चलता है कि हम स्वयं ही साक्षी हैं। यह अवस्था आत्म-साक्षात्कार है। आत्म-साक्षात्कार में 'साक्षी' और 'साक्षी होने का भाव' दोनों समाप्त हो जाते हैं। केवल एक चैतन्य शेष रहता है। रमण महर्षि कहते थे - 'मैं साक्षी हूँ' यह भी एक विचार है। साक्षी तो वह है जो इस विचार को भी देखता है। अंत में साक्षी, दृश्य, साक्षित्व - सब एक हो जाते हैं। यही अद्वैत अनुभूति है। पर साधक के लिए साक्षी भाव का अभ्यास ही मुक्ति का सबसे सरल मार्ग है।
साक्षी भाव और ध्यान में क्या अंतर है?
ध्यान एक क्रिया है, साक्षी भाव उस क्रिया का परिणाम या अवस्था है। ध्यान हम करते हैं - हम बैठते हैं, एकाग्र होते हैं। साक्षी भाव तो एक जीवनशैली है, एक चेतना की अवस्था है। ध्यान के अभ्यास से साक्षी भाव विकसित होता है। जब ध्यान गहरा होता है, तो हम अपने विचारों को देखने लगते हैं। यही साक्षी भाव की शुरुआत है। धीरे-धीरे यह भाव ध्यान से बाहर भी आ जाता है - हम चलते-फिरते, खाते-पीते, काम करते हुए भी साक्षी बन जाते हैं। तब ध्यान और साक्षी भाव एक हो जाते हैं। कहा भी गया है - स्थिरमनः साक्षी भावः (स्थिर मन ही साक्षी भाव है)। इसलिए ध्यान करें, पर उसके साथ जागरूकता भी लाएँ - कि कौन ध्यान कर रहा है? यह साक्षी को जगाने का सबसे प्रभावी तरीका है।

साक्षी बनें, मुक्त हो जाएँ

यह सब हो रहा है - देखो, मत उलझो। साक्षी भाव ही सबसे सरल साधना है, और सबसे गहरा ज्ञान भी।

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