साक्षी भाव: ईश्वर की दृष्टि का रहस्य
ईश्वर का साक्षी स्वरूप, बिना हस्तक्षेप के सब कुछ देखना, और साक्षी भाव की साधना
साक्षी भाव क्या है? ईश्वर का साक्षी स्वरूप कैसा है? हम साक्षी कैसे बनें? 'साक्षी' शब्द का अर्थ है - गवाह, देखने वाला, जो बिना हस्तक्षेप के केवल देखता है। सनातन दर्शन में ईश्वर को 'साक्षी चेतना' कहा गया है - जो सब कुछ देखता है, पर किसी में उलझता नहीं। जैसे एक चौराहे पर लगा सीसीटीवी कैमरा सबको देखता है, पर उनसे प्रभावित नहीं होता, वैसे ही ईश्वर इस सृष्टि रूपी नाटक को देख रहे हैं। आइए, इस साक्षी भाव के रहस्य को विस्तार से समझें।
"उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥"
(इस शरीर में परमात्मा उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता और महेश्वर के रूप में स्थित है।)
प्रथम चरण - जाग्रत साक्षी: हम अपने कार्यों, विचारों, भावनाओं को देखना शुरू करते हैं। जैसे कोई तीसरा व्यक्ति हमारे मन को देख रहा हो।
द्वितीय चरण - स्वप्न साक्षी: ध्यान की गहरी अवस्था में हम सपनों को भी साक्षी भाव से देखने लगते हैं। मन के उतार-चढ़ाव हमें प्रभावित नहीं करते।
तृतीय चरण - तुरीय अवस्था: साक्षी और दृश्य का भेद मिट जाता है। हम स्वयं साक्षी बन जाते हैं। यही मोक्ष की अवस्था है, जहाँ कर्ता, कर्म, क्रिया - तीनों समाप्त हो जाते हैं। केवल चैतन्य शेष रहता है।
साक्षी भाव के लाभ
शास्त्रों में साक्षी भाव
(इस शरीर में परमात्मा उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता और महेश्वर है।)
(जैसे हवा रहित स्थान में दीपक नहीं हिलता, वैसे ही योगी का मन स्थिर रहता है।)
(आत्मा साक्षी, चेतन, केवल और निर्गुण है।)
(उसे निर्लिप्त साक्षी कहते हैं।)
भोगी, योगी और साक्षी में अंतर
| भोगी | योगी | साक्षी |
|---|---|---|
| संसार में उलझा रहता है | संसार से भागता है | संसार में रहकर भी निर्लिप्त |
| सुख-दुख से प्रभावित | सुख-दुख से बचना चाहता है | सुख-दुख को देखता है, प्रभावित नहीं |
| 'मैं करता हूँ' का भाव | 'मैं नहीं करता' का भाव | 'सब हो रहा है' का भाव |
| आसक्त | विरक्त | समता में स्थित |
| अज्ञानी | साधक | ज्ञानी |
साक्षी भाव कैसे विकसित करें?
ध्यान (मेडिटेशन)
प्रतिदिन ध्यान करें। विचारों को देखें, उनसे लड़ें नहीं, बस देखें। धीरे-धीरे आप विचारों से अलग होने लगेंगे।
शरीर से अलग करके देखना
'मैं यह शरीर नहीं हूँ' - इस भाव का अभ्यास करें। भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी को शरीर में होते हुए देखें।
भावनाओं को देखना
क्रोध आए तो कहें - 'मुझ में क्रोध आ रहा है', 'मैं क्रोधित हूँ' न कहें। भावना और आप अलग हैं।
नाम जप और स्वयं साक्षी
नाम जप करते समय देखें कि कौन जप कर रहा है? शरीर? मन? या कोई और? यह साक्षी को जगाता है।
सबको नाटक मानें
जीवन को एक नाटक मानें। नाटक में सब हो रहा है, पर अभिनेता जानता है कि यह सब असली नहीं।
आकाश की तरह बनें
आकाश पक्षियों को उड़ते देखता है, पर वह न तो पक्षी बनता है, न उनमें उलझता है। वैसे ही बनें।
साक्षी भाव में बाधक कारक:
अहंकार: 'मैं कर रहा हूँ' का भाव साक्षी भाव को नष्ट करता है।
आसक्ति: जहाँ आसक्ति है, वहाँ निर्लिप्तता नहीं हो सकती।
राग-द्वेष: पसंद-नापसंद साक्षी को ढक लेते हैं।
नींद और तमोगुण: जड़ता में साक्षी भाव नहीं जगता।
अत्यधिक सक्रियता: बहुत अधिक कर्मों में उलझे रहने से साक्षी खो जाती है।
विचारों की अधिकता: लगातार सोचते रहने से देखने का समय नहीं मिलता।
साक्षी भाव से जुड़े प्रश्न
साक्षी बनें, मुक्त हो जाएँ
यह सब हो रहा है - देखो, मत उलझो। साक्षी भाव ही सबसे सरल साधना है, और सबसे गहरा ज्ञान भी।
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