सर्वांतर्यामी: सबके भीतर एक ही परमात्मा

एक ही परमात्मा का सबके हृदय में वास, सर्वव्यापकता का रहस्य और अंतर्यामी की साधना

सर्वांतर्यामी: हृदय में बसे परमात्मा

सर्वांतर्यामी क्या है? क्या ईश्वर सबके भीतर है? अंतर्यामी को कैसे जानें? 'सर्वांतर्यामी' शब्द का अर्थ है - जो सबके अंदर व्याप्त है, सबके हृदय में निवास करता है, और सबको नियंत्रित करता है। सनातन दर्शन के अनुसार, एक ही परमात्मा सब प्राणियों के हृदय में विराजमान है। चाहे कोई मनुष्य हो, पशु, पक्षी, या कीट - सबके भीतर वही एक चेतना है। वही साक्षी है, वही अंतर्यामी है, वही हमारे सुख-दुख, विचार-भावनाओं को जानता है। आइए, इस सर्वांतर्यामी के रहस्य को विस्तार से समझें।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति

"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥"
(हे अर्जुन, परमात्मा सब प्राणियों के हृदय में स्थित है, और अपनी माया से सबको यंत्र पर चढ़े हुए की भाँति घुमा रहा है।)

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सर्वांतर्यामी का अर्थ: अंदर व्याप्त परमात्मा
सर्वांतर्यामी का अर्थ है - जो सबके अंदर है, सबको जानता है, और सबको संचालित करता है। 'अन्तर्यामी' शब्द दो भागों से बना है - 'अन्तर' (भीतर) और 'यामी' (नियंत्रित करने वाला)। यह परमात्मा का वह स्वरूप है जो हमारे हृदय के भीतर बैठा हमारे सब कुछ को देख रहा है। हम जो सोचते हैं, वह जानता है। हम जो करते हैं, वह देखता है। पर वह हमारे कर्मों में हस्तक्षेप नहीं करता - वह केवल साक्षी है, और साथ ही सबका नियंत्रक भी। यही रहस्य है - वह करता भी है, और कर्ता भी नहीं है। गीता में कृष्ण कहते हैं - 'मैं सबके हृदय में हूँ, मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मरण होता है।'
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गीता में अंतर्यामी का वर्णन
श्रीकृष्ण गीता के 18वें अध्याय में अंतर्यामी का स्पष्ट वर्णन करते हैं। वे कहते हैं - "सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः" (मैं सबके हृदय में स्थित हूँ)। और आगे कहते हैं - "मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च" (मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मरण होता है)। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारी हर क्रिया, हर विचार, हर भावना का स्रोत वही परमात्मा है। हम सोचते हैं कि हम कर रहे हैं, पर वास्तव में वही सब कुछ कर रहा है। हम तो केवल निमित्त हैं। यह ज्ञान होते ही अहंकार मिट जाता है और हम उस अंतर्यामी को पहचानने लगते हैं। जो उसे पहचान लेता है, वह सब कुछ जान लेता है।
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सर्वव्यापकता और अंतर्यामित्व
ईश्वर सर्वव्यापक है - वह हर जगह है। पर 'सर्वांतर्यामी' उसके और भी गहरे स्वरूप को दर्शाता है। सर्वव्यापकता का अर्थ है - वह पत्थर में भी है, पानी में भी है, हवा में भी है। पर अंतर्यामी का अर्थ है - वह चेतन प्राणियों के हृदय में विशेष रूप से निवास करता है, और उनके अंतःकरण को जानता है। एक ही परमात्मा सबमें है, पर वह सबको अलग-अलग जानता है। जैसे एक ही सूर्य सब पर चमकता है, पर हर व्यक्ति की छाया अलग होती है - वैसे ही एक ही अंतर्यामी सबके कर्मों के अनुसार सबको फल देता है। यही उसकी अद्भुत लीला है - एक होकर भी अनेक रूपों में प्रकट होना।
हृदय गुहा में विराजमान परमात्मा

उपनिषदों के अनुसार, परमात्मा हृदय की गुहा (दहलिज़) में निवास करता है। यह स्थान भौतिक हृदय नहीं, बल्कि आध्यात्मिक हृदय है - जहाँ से चेतना का संचार होता है। इस हृदय गुहा में परमात्मा अंगुष्ठ मात्र रूप में विराजमान है। यही स्थान ध्यान का केंद्र है। जब साधक अपनी दृष्टि को बाहर से हटाकर इस भीतरी हृदय में लगाता है, तो उसे अंतर्यामी के दर्शन होते हैं। 'हृदय' शब्द का अर्थ है - हृ (देना) + दय (दया) - जो दया देता है। परमात्मा हृदय में बैठकर ही हमें ज्ञान, भक्ति और मुक्ति की दया प्रदान करता है। इसलिए हृदय को परमात्मा का सिंहासन कहा गया है।

अंतर्यामी के विभिन्न स्वरूप

बुद्धि में अंतर्यामी
बुद्धि के माध्यम से वह निर्णय लेता है। हम सोचते हैं हम निर्णय ले रहे हैं, पर वही सबका अंतर्यामी हमारी बुद्धि को दिशा देता है।
मन में अंतर्यामी
मन के सभी विकार, भावनाएँ, विचार - उसी के संकेत से चलते हैं। वह मन के हर कोने को जानता है।
इंद्रियों में अंतर्यामी
आँखें देखती हैं, पर देखने वाला वह है। कान सुनते हैं, पर सुनने वाला वह है। वह सब इंद्रियों के पीछे का चेतन स्रोत है।
प्राण में अंतर्यामी
श्वास चल रही है - यह उसी की कृपा है। प्राणों के संचालक वही हैं। प्राणायाम से हम उस अंतर्यामी के निकट पहुँचते हैं।

शास्त्रों में अंतर्यामी

"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति"
(हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।)
- श्रीमद्भगवद्गीता (18.61)
"अन्तर्याम्यमृतश्च सर्वेषां भूतानाम्"
(वह सब प्राणियों का अंतर्यामी और अमर है।)
- बृहदारण्यक उपनिषद् (3.7.3)
"स एषोऽन्तर्याम्यमृतः"
(वह यह अंतर्यामी अमर है।)
- बृहदारण्यक उपनिषद्
"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः"
(और मैं सबके हृदय में स्थित हूँ।)
- गीता (15.15)
"हृदि ह्येष आत्मा"
(यह आत्मा हृदय में ही है।)
- छांदोग्य उपनिषद् (8.3.3)
"तमेव भान्तमनुभाति सर्वं"
(जिसके प्रकाश से सब प्रकाशित होते हैं।)
- कठोपनिषद् (2.2.15)

बाह्य ईश्वर और अंतर्यामी में अंतर

बाह्य ईश्वर (सगुण) अंतर्यामी (अंतरात्मा)
मंदिर, मस्जिद, चर्च में हृदय के मंदिर में
रूप, आकार, गुणों से युक्त निराकार, सूक्ष्म, सर्वव्यापी
बाह्य उपासना की आवश्यकता आंतरिक ध्यान की आवश्यकता
दूर प्रतीत होता है Whetherनिकटतम, अपने भीतर
बड़े-बड़े यज्ञ-अनुष्ठान एकाग्र मन और प्रेम
कभी दिखता, कभी नहीं सदा उपस्थित, कभी नहीं छोड़ता

अंतर्यामी को कैसे जानें?

हृदय में ध्यान

अपनी दृष्टि को भौतिक हृदय के स्थान पर लगाएँ। अनुभव करें कि वहाँ एक ज्योति है, एक चेतना है। यही अंतर्यामी का द्वार है।

'सोहम्' का जप

'सोहम्' (सः + अहम्) का अर्थ है - वह मैं हूँ। श्वास अंदर लेते 'सो', बाहर छोड़ते 'हम्'। यह जप हृदय में अंतर्यामी का स्मरण कराता है।

सब में एक को देखना

हर प्राणी में, हर व्यक्ति में उसी परमात्मा को देखने का अभ्यास करें। 'सबमें वही है' - यह भाव अंतर्यामी की अनुभूति कराता है।

प्रश्न करो: कौन जानता है?

'मैं जानता हूँ' - यह 'मैं' कौन है? 'यह देह' या 'वह चेतना'? इस प्रश्न का उत्तर अंतर्यामी की ओर ले जाता है।

अंतर्यामी का साक्षात्कार: जीवन में आने वाले परिवर्तन
हर किसी में भगवान दिखना: 'सबमें एक ही परमात्मा' - यह भाव स्थिर हो जाता है। किसी से द्वेष नहीं रहता।
अकेलापन समाप्त: जब पता चलता है कि भीतर वह सदा विराजमान है, तो कोई अकेलापन नहीं रहता।
भय का नाश: जिसके भीतर परमात्मा है, उसे किसी का भय नहीं लगता। वह सबसे निर्भीक हो जाता है।
निरंतर आनंद: बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, भीतर वह आनंद का स्रोत सदा बहता रहता है।
सहजता और निर्लिप्तता: वह दुनिया में रहता है, पर दुनिया का बंधन उसे नहीं छूता। वह अंतर्यामी में ही रमा रहता है।
सही निर्णय की प्राप्ति: जब अंतर्यामी के साथ संपर्क स्थापित हो जाता है, तो अंतर्ज्ञान जाग जाता है। सही-गलत का पता चलता है।

अंतर्यामी से जुड़े प्रश्न

क्या अंतर्यामी और आत्मा एक हैं?
अंतर्यामी और आत्मा में गहरा संबंध है, पर पूर्णतः एक नहीं हैं। आत्मा (जीवात्मा) हमारा व्यक्तिगत चेतन स्रोत है, जो इस एक शरीर में है। अंतर्यामी (परमात्मा) सभी आत्माओं में व्याप्त चेतना है, जो सबको नियंत्रित करती है। जैसे एक बड़े वृक्ष की सभी शाखाओं में एक ही रस बहता है - वैसे ही अंतर्यामी सब आत्माओं में एक ही रूप में है। जब हम कहते हैं 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) - तब आत्मा और अंतर्यामी का भेद मिट जाता है। साधारण अवस्था में हम आत्मा को 'मैं' मानते हैं, और अंतर्यामी को 'वह'। ज्ञान की अवस्था में 'मैं' और 'वह' एक हो जाते हैं। यही अद्वैत का रहस्य है।
क्या अंतर्यामी हमारे पाप-पुण्य से प्रभावित होता है?
नहीं, अंतर्यामी न तो पाप से दूषित होता है, न पुण्य से प्रभावित। वह तो सदा पवित्र, सदा शुद्ध, सदा निर्लिप्त है। जैसे सूर्य की किरणें गंदगी पर भी पड़ती हैं, पर सूर्य गंदा नहीं होता। वैसे ही अंतर्यामी सबके भीतर होते हुए भी किसी के पाप-पुण्य से लिप्त नहीं होता। हमारे कर्मों का फल हमें मिलता है, पर वह केवल साक्षी है। जैसे एक न्यायाधीश अपराधी को दंड देता है, पर वह न्यायाधीश स्वयं अपराधी नहीं बनता। वैसे ही अंतर्यामी हमारे कर्मों को देखता है, उनका फल देता है, पर स्वयं अप्रभावित रहता है। यही उसकी अलौकिकता है - लीला में रहकर भी लीला से परे।
अंतर्यामी को प्रसन्न कैसे करें?
अंतर्यामी को प्रसन्न करने के लिए बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि चाहिए। वह तो हमारे हृदय में है - वह हमारी हर भावना को जानता है। उसे प्रसन्न करने के सबसे सरल उपाय हैं:
1. प्रेम: निष्काम प्रेम, बिना किसी शर्त के। जैसे माँ बच्चे से प्रेम करती है।
2. स्मरण: निरंतर उसका स्मरण - चलते-फिरते, खाते-पीते, सोते-जागते। 'नाम जपो' - यही सबसे सरल साधन है।
3. शरणागति: पूर्ण समर्पण - 'तू ही सब कुछ है, मैं कुछ नहीं।'
4. दूसरों में उसे देखना: सबकी सेवा में उसी की सेवा।
5. विनम्रता: अहंकार त्यागना। जहाँ अहंकार है, वहाँ अंतर्यामी से दूरी है। इन साधनाओं से वह शीघ्र प्रसन्न होता है, और अपने भक्तों को अपना दर्शन देता है।
क्या अंतर्यामी हमारी प्रार्थना सुनता है?
हाँ, अंतर्यामी हमारी प्रत्येक प्रार्थना सुनता है, वह तो हमारे हृदय में है। हमें बाहर चिल्लाने की ज़रूरत नहीं। हम जो कुछ भी मन में सोचते हैं, वह उसे तुरंत पता चलता है। पर प्रार्थना सुनना और उसका उत्तर देना दो अलग बातें हैं। वह सबकी प्रार्थना सुनता है, पर उत्तर उसी को देता है जो उसके भाव को समझता है। जो प्रार्थना 'स्वार्थ' से रहित हो, जो केवल प्रेम से की गई हो, जो उसकी शरण में हो - वह प्रार्थना अवश्य सफल होती है। अंतर्यामी देर से भले उत्तर दे, पर कभी निराश नहीं करता। इसलिए धैर्य रखें, प्रार्थना करते रहें, और जो होता है उसे उसकी इच्छा मानें। यही सच्ची श्रद्धा है।
अंतर्यामी का साक्षात्कार होने पर क्या होता है?
अंतर्यामी का साक्षात्कार सबसे बड़ी उपलब्धि है - यही मोक्ष है, यही परम आनंद है। जब साधक के भीतर अंतर्यामी प्रकट होता है, तो:
1. वह जान लेता है कि वह अकेला कभी नहीं था - वह सदा उसके साथ था, बस वह भूल गया था।
2. उसे सब प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं - क्योंकि वह स्वयं उत्तर बन जाता है।
3. भय, चिंता, दुःख - सब समाप्त हो जाते हैं। केवल शांति, केवल आनंद शेष रहता है।
4. वह हर प्राणी में, हर वस्तु में अब उसी अंतर्यामी को देखता है। सब उसके प्रिय हो जाते हैं।
5. उसे मृत्यु का भय नहीं रहता - क्योंकि वह जानता है कि वह अमर है।
6. वह 'जीवन्मुक्त' हो जाता है - इसी जीवन में मुक्त। यही साक्षात्कार का फल है। जिसे यह प्राप्त हो जाता है, उसे और कुछ चाहिए नहीं रहता।

अपने हृदय में बसे अंतर्यामी को पहचानें

वह तुम्हारे भीतर है, मेरे भीतर है, सबके भीतर है। बस आँखें बंद करो, अंदर देखो, और उसका दर्शन करो।

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