सर्वांतर्यामी: सबके भीतर एक ही परमात्मा
एक ही परमात्मा का सबके हृदय में वास, सर्वव्यापकता का रहस्य और अंतर्यामी की साधना
सर्वांतर्यामी क्या है? क्या ईश्वर सबके भीतर है? अंतर्यामी को कैसे जानें? 'सर्वांतर्यामी' शब्द का अर्थ है - जो सबके अंदर व्याप्त है, सबके हृदय में निवास करता है, और सबको नियंत्रित करता है। सनातन दर्शन के अनुसार, एक ही परमात्मा सब प्राणियों के हृदय में विराजमान है। चाहे कोई मनुष्य हो, पशु, पक्षी, या कीट - सबके भीतर वही एक चेतना है। वही साक्षी है, वही अंतर्यामी है, वही हमारे सुख-दुख, विचार-भावनाओं को जानता है। आइए, इस सर्वांतर्यामी के रहस्य को विस्तार से समझें।
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥"
(हे अर्जुन, परमात्मा सब प्राणियों के हृदय में स्थित है, और अपनी माया से सबको यंत्र पर चढ़े हुए की भाँति घुमा रहा है।)
उपनिषदों के अनुसार, परमात्मा हृदय की गुहा (दहलिज़) में निवास करता है। यह स्थान भौतिक हृदय नहीं, बल्कि आध्यात्मिक हृदय है - जहाँ से चेतना का संचार होता है। इस हृदय गुहा में परमात्मा अंगुष्ठ मात्र रूप में विराजमान है। यही स्थान ध्यान का केंद्र है। जब साधक अपनी दृष्टि को बाहर से हटाकर इस भीतरी हृदय में लगाता है, तो उसे अंतर्यामी के दर्शन होते हैं। 'हृदय' शब्द का अर्थ है - हृ (देना) + दय (दया) - जो दया देता है। परमात्मा हृदय में बैठकर ही हमें ज्ञान, भक्ति और मुक्ति की दया प्रदान करता है। इसलिए हृदय को परमात्मा का सिंहासन कहा गया है।
अंतर्यामी के विभिन्न स्वरूप
शास्त्रों में अंतर्यामी
(हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।)
(वह सब प्राणियों का अंतर्यामी और अमर है।)
(वह यह अंतर्यामी अमर है।)
(और मैं सबके हृदय में स्थित हूँ।)
(यह आत्मा हृदय में ही है।)
(जिसके प्रकाश से सब प्रकाशित होते हैं।)
बाह्य ईश्वर और अंतर्यामी में अंतर
| बाह्य ईश्वर (सगुण) | अंतर्यामी (अंतरात्मा) |
|---|---|
| मंदिर, मस्जिद, चर्च में | हृदय के मंदिर में |
| रूप, आकार, गुणों से युक्त | निराकार, सूक्ष्म, सर्वव्यापी |
| बाह्य उपासना की आवश्यकता | आंतरिक ध्यान की आवश्यकता |
| दूर प्रतीत होता है Whetherनिकटतम, अपने भीतर | |
| बड़े-बड़े यज्ञ-अनुष्ठान | एकाग्र मन और प्रेम |
| कभी दिखता, कभी नहीं | सदा उपस्थित, कभी नहीं छोड़ता |
अंतर्यामी को कैसे जानें?
हृदय में ध्यान
अपनी दृष्टि को भौतिक हृदय के स्थान पर लगाएँ। अनुभव करें कि वहाँ एक ज्योति है, एक चेतना है। यही अंतर्यामी का द्वार है।
'सोहम्' का जप
'सोहम्' (सः + अहम्) का अर्थ है - वह मैं हूँ। श्वास अंदर लेते 'सो', बाहर छोड़ते 'हम्'। यह जप हृदय में अंतर्यामी का स्मरण कराता है।
सब में एक को देखना
हर प्राणी में, हर व्यक्ति में उसी परमात्मा को देखने का अभ्यास करें। 'सबमें वही है' - यह भाव अंतर्यामी की अनुभूति कराता है।
प्रश्न करो: कौन जानता है?
'मैं जानता हूँ' - यह 'मैं' कौन है? 'यह देह' या 'वह चेतना'? इस प्रश्न का उत्तर अंतर्यामी की ओर ले जाता है।
अंतर्यामी का साक्षात्कार: जीवन में आने वाले परिवर्तन
हर किसी में भगवान दिखना: 'सबमें एक ही परमात्मा' - यह भाव स्थिर हो जाता है। किसी से द्वेष नहीं रहता।
अकेलापन समाप्त: जब पता चलता है कि भीतर वह सदा विराजमान है, तो कोई अकेलापन नहीं रहता।
भय का नाश: जिसके भीतर परमात्मा है, उसे किसी का भय नहीं लगता। वह सबसे निर्भीक हो जाता है।
निरंतर आनंद: बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, भीतर वह आनंद का स्रोत सदा बहता रहता है।
सहजता और निर्लिप्तता: वह दुनिया में रहता है, पर दुनिया का बंधन उसे नहीं छूता। वह अंतर्यामी में ही रमा रहता है।
सही निर्णय की प्राप्ति: जब अंतर्यामी के साथ संपर्क स्थापित हो जाता है, तो अंतर्ज्ञान जाग जाता है। सही-गलत का पता चलता है।
अंतर्यामी से जुड़े प्रश्न
1. प्रेम: निष्काम प्रेम, बिना किसी शर्त के। जैसे माँ बच्चे से प्रेम करती है।
2. स्मरण: निरंतर उसका स्मरण - चलते-फिरते, खाते-पीते, सोते-जागते। 'नाम जपो' - यही सबसे सरल साधन है।
3. शरणागति: पूर्ण समर्पण - 'तू ही सब कुछ है, मैं कुछ नहीं।'
4. दूसरों में उसे देखना: सबकी सेवा में उसी की सेवा।
5. विनम्रता: अहंकार त्यागना। जहाँ अहंकार है, वहाँ अंतर्यामी से दूरी है। इन साधनाओं से वह शीघ्र प्रसन्न होता है, और अपने भक्तों को अपना दर्शन देता है।
1. वह जान लेता है कि वह अकेला कभी नहीं था - वह सदा उसके साथ था, बस वह भूल गया था।
2. उसे सब प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं - क्योंकि वह स्वयं उत्तर बन जाता है।
3. भय, चिंता, दुःख - सब समाप्त हो जाते हैं। केवल शांति, केवल आनंद शेष रहता है।
4. वह हर प्राणी में, हर वस्तु में अब उसी अंतर्यामी को देखता है। सब उसके प्रिय हो जाते हैं।
5. उसे मृत्यु का भय नहीं रहता - क्योंकि वह जानता है कि वह अमर है।
6. वह 'जीवन्मुक्त' हो जाता है - इसी जीवन में मुक्त। यही साक्षात्कार का फल है। जिसे यह प्राप्त हो जाता है, उसे और कुछ चाहिए नहीं रहता।
अपने हृदय में बसे अंतर्यामी को पहचानें
वह तुम्हारे भीतर है, मेरे भीतर है, सबके भीतर है। बस आँखें बंद करो, अंदर देखो, और उसका दर्शन करो।
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